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जीवन के विकल्प

जब सब सपने बिखर जाते है,

जब हम अपनो को अपने से दूर पाते है,

जब चाहने वाले ही रास्ते का पत्थर बन जाते है,

जब हम लोगो की आँखों मे चुभ जाते है,

जब हम ही अपनी योग्यता पर शक कर जाते है,

जब हम हार कर दरवाजो के पीछे छिप जाते है।

ये सब कुछ हम अपने गाढ़े समय में कर जाते है,

ये सब करना हम सब को आम आदमी बना जाते है,

ये सब कुछ हम सब को  औसत जिंदगी दे जाते है,

ये सब कुछ हम सब को सामान्य आकांक्षा दे जाते है,

ये सब कुछ हम सब को साधारण व्यक्ति से बन मार जाते है |


भूपेन्द्र बनने का कोई  सयोंग नही होता,

व्योम स्पर्श की कोई मार्ग नही होता,

सिंघासन खुद कभी खाली नही होता,

सुयोग्य कोई पैदा नही होता।

जानते हो क्या होता है…?

जीवन हमें हमेशा कई विकल्प देता है,

और हम जो विकल्प लेते है ,वैसे बन जाते है,

कृप्या अपना विकल्प समझ कर चुने …!

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©Abhishek Yadav 2021

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सतरंगी ज़िन्दगी

घनी बदली के बीच, तेज़ चमकीली धुप सी खिल आती तुम,
पर लोगो को निज पास घुमड़ते ; लुक छिप जाती तुम,
देखो देखो , आयी तुम, देखो देखो बिसराई तुम,
कभी काले मेघा , कभी नीले आकाश , सी ,
बदल जाती तुम,
कभी टप टप सी बूंदे बन, मुझ पर ही गिर जाती तुम,
कभी गौरैया सी फुर्र सै नजरो सै ओझल हो जाती तुम,
और कभी सपनो के इंद्रधनुष बनती ,

कभी जीवन के गर्त में ले जाती तुम

तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ?
मेरे होने का कारण क्या है ?
ये सोच बही बतलाती तुम

तुम्हे पता है ज़िन्दगी !
ये सारे तमाशे मुझे ; रोज दिखलाती तुम।

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© Abhishek Yadav -2021

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हमारी ज़िन्दगी

जिंदगी गुजार दी आप धापी में जी कर,
कभी मेट्रो में लटक कर , कभी कन्धो पर लैपटॉप ढो कर,
नज़र फीकी पड़ गयी , ईमेल पढ़ कर,
जूते घिस गये केबिनो के सजदे कर ,
दुनिया बेच दी , स्लाइडें बना कर,
काले बालो से, बिन बालो वाले हो गये बन कर ,

शायद इस लिए , की इएमआई काट जाये,
शायद इस लिए , की कुछ खाते में बच जाये ,
शायद इस लिए , की अपनी डिग्री काम में आ जाये ,
शायद इस लिए, की माँ -बाप का नाम रह जाये ,

इस रेलम-पेल बस एक कसक बाकी रह गयी ,
अपने लिए कुछ न कर पाये,
एक लम्हा थमा से सुर्ख,चटकीला ;महसूस नहीं कर पाये ,
हाय! हम अपनी ज़िंदगी अपनी सी ;जी नहीं पाये।

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© Abhishek Yadav- 2021

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सोचा था ….

सोचा था , कुछ पैसे जोड़ पाएंगे ,
सोचा था , कुछ नया बनाएगे ,
सोचा था कुछ रिस्तेदारो मिलने जायगे
सोचा था , कुछ दोस्तों से गप्पे हाक पाएंगे ,
सोचा था , कुछ नया खायेगे,
सोचा था , कुछ नयी जगह जायगे ,
सोचा था , कुछ नये कपडे सिलवायेगे ,
सोचा था , कुछ अबकी नया सीख पाएंगे ,
सोचा था, कुछ अबकी तरक्की पाएंगे।

अभी सोच ही रहा था , की कलम जम सी गयी ,
ये तो साल २०२१ है;
सोच सोच में कब साल २०२० निकल गया ;
पलक भर एहसास भी नहीं हुआ ,
ये साल बीस, कुछ अजीब रहा ,
सिर्फ सोचते -सोचते में ही ,
हम सब की सोच निकल गयी, की


कितने बेबस , मजलूम रहे हम सब ,
कुछ न कर पाये हम सब, सिवाए सोचने के
..

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© Abhishek Yadav- 2021

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पनोती

कुछ तो बात होगी तुम में ,
हज़ारो शमा के बीच में रहकर भी ,
तुम्हारी रौशनी की यादें, आज भी चटकती है,
सुनहरी रेत आज भी , आँखों के कतरे से बहती है ,
पर चुभती नहीं है ।

 

 

खास तो है तुम में ,की मेरे यादो के भवर के ,
बीचो बीच में तुम हो ,
यु ही इश्क़बाज़ी, का समंदर आ कर तुम पर सूख गया |

 

 

ऐसी ही बाते , बहुत सी, बतलानी, समझनी थी तुम को,
पर तुम तो जानती हो ,
निगाहे मेरी ठहरी पनोती,
लग गयी मुझको ,
जिस रोज तुम्हे आँखो में बिठा के आईना देखा था ।

 

 

अब क्या कहुँ, जाते जाते ;
जरा अपनी यादों के कसक की दवा बताती जाना ,
बड़ी टीस मचती है अकेलेपन में ।

 

© Abhishek Yadav- 2018

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प्रतिकर्षण

अंतर पड़ता है ,जब सूरज चमकता है , और मंद हो जाता है ।
जब चाँद रौशनी देता है , और जब छुप जाता है ।
हवाओ के होने और न होने पर कमी महसूस होती है ।
जब कुछ भी बदलता है , हमारे चारो ओर,
तब कमी साफ साफ दिखती है ।

 

 

मेरी, और तुम्हारी ,और हम सबकी आदत है ,
अपने लोगो को इतना अपना मान लेने की ,
वो हमसाया सा ,बन जाते है , हमारे लिए  |

 

 

पर ; साये की की कमी महसूस होती है ,
अपनी घुउप अँधेरी रात में;
जब आप और आप की सासों के दर्मया कोई भी नहीं होता ।

 

 

गलती मेरी थी, की तुम्हे इतना माना , की “खुद आप” ही समझ बैठे,
पर अफ़सोस ये भूल बैठे की , ज्यादा नज़दीकिया ,
धकेलती भी है एक दूसरे दूर , कभी कभी काफी दूर तक।

 

 

तुम ही देख लो तुम्हारे “प्रतिकर्षण” का नतीजा ,
आज हम सिर्फ एक दूसरे को दूर से देख सकते है ,
क्यों की एक शांत नदी बह रही है हमारे बीच ।

 

©Abhishek Yadav -2018

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अनंत  की ओर

कुछ नहीं ,क्या और कहे ;
बस ख़ामोशी है , जो बोल रही है ।

 

हजारो की भीड़ है मेरे चारो ओर, फिर भी कुछ दूरी है;
जो बन रखी है, दरम्यान मेरे और लोगो के ।
कुछ है भी नहीं मेरे और उन लोगो के बीच ,
फिर भी खइया खुदी पड़ी है ; मेरे और लोगो के बीच ,
बे बेबस सा खड़ा खुद को देखता सा रहता हूँ।

 

न जाने क्यों ऐसे हालत बन गए है, की
वीराना भी फुसफुसाता से सुनाइए पड़ता है ,
शायद कुछ कुछ चुगलियाँ सा महसूस होता है ।

 

 

बहुत कुछ धुंधला ; सिला सिला सा घूमता है ;
मेरे चारो ओर , कुछ घुटन सा भरा ।

 

बस एक साथ है जो मेरे वो , मेरी धड़कने है ,
बस ताल बजाती ज़िन्दगी की ,
कुछ नज़्मे सुनती रोशनी की ,

 

बस इसी रौशनी के डोर लेकर चलना है ,
और चलते जाना है , अपना सहारा खुद बन कर ,
न किसी के लिए , न किसी को ले कर ,
बस आगे खुद को किये ।

 

बस एक यात्रा करनी है ,
खुद से खुद की ,
खुद से खुद के लिए ,
बस चलना है ,
अनंत  की ओर |

 

© Abhishek Yadav- 2018

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Poetry

You dear lady …

 

Whenever in need, you were closer to me,

Presented, even not needed,

In countless forms, infinite relations, uncountable meanings;

You were somewhere around me, imminent to me.

 

 

Life couldn’t be nurture without you,

Neither living can go on without you.

When you are with me, I feel complete,

Without you I am hollow, sounds empty.

 

 

Proclaiming myself the strong is my obligation,

Allowing me to feel stronger, your gratitude;

I feel rock solid because you show superficial to me.

 

 

I am stronger, from you,

I am weak, that too also from you;

I measure; I resemble, I compare all of you,

Independently, solitary, I don’t have existence,

For my own existence, I need your presence.

 

 

Words are infinite; emotions are endless, honor towards you endless,

 can’t conclude, just in simple words…

Ladies Without You Men Are Nonexistent

 

 

Dedicated to my Mother, My Siter and all women whom i know and don't

© Abhishek Yadav 2018

Hindi

वन्दनीये

जब जरुरत होती है, होती हो तुम कही ,

जब जरुरत नहीं भी होती है , तो तुम ही होती हो ;

न जाने कितने रूपों , कितने व्यक्तित्व्यों , कितने सम्बन्धो में;

कब से, कहाँ से, मेरे साथ बनी हो।

 

 

जीवन  न तुम्हारे बिन सुरु हो सकता है ,

न ज़िंदगी तुम बिन चल सकती है ;

तुम्हारे होने पर लगता है खुद का पूरा होना ,

तुम्हारे बगैर ,कुछ कमी सी खटकती है ।

 

 

पुरुष हो कर न कमजोर होना मेरी तो मज़बूरी है ,

और मुझे मजबूत होने देना तुम्हारा बड्डपन है ;

मेरा खुद को फौलाद दिखाना तो  छलावा है ,

क्यों  की तुम ने हमेशा खुदको कमज़ोर दिखाया है ।

 

 

 

मैं मज़बूत हूँ, तो तुम से हूँ ,

मैं कमज़ोर हूँ तो तुम से हूँ ,

मेरा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं ,

मेरा अस्तित्व पाने के लिए भी , तुम्हारा अस्तित्वे जरुरी है ।

 

 

भावनायें तो असीमित , अपरिमित , अतुलित है ;

बस तुम्हारे लिए  एक शब्द…

नारी तुम वन्दनीये हो ।

 

मेरी माँ , मेरी बहन और उन सारी महिलाओं को सो समर्पित जिन्हे मैं जानता और नहीं जानता हूँ ।

© Abhishek Yadav 2018

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Poetry

Long Distance Relationship

When we don’t talk is this the distance?

When we don’t ask how we are is this the distance?

When we don’t contact our eyes is that is the distance?

When we ignore each other is that is the distance?

 

Distances are not gap of physical measures,

Distances are not gap in understanding,

Distances are not gap in mutual admiring,

Distances are not gap of judgments,

 

Distances are when we couldn’t understand each other’s silence

Distances are  when we can’t respect our diversity,

Distances when we overlook learning from our mistakes,

Distances are when we don’t  encourage each other,

 

Distances are not distanced till it only in mind of each other,

Distances are not distanced till we defend each other,

Distances are not distanced till we struggle for each other,

Distances are not distanced till we  motivate each other,

 

There is distance between the earth and moon,

Still, they are in relationship with  each other, from very long distance,

Yet, they are in harmony, in love, in affection, in a relationship,

Yes because they  are in a true relationship,

In Long distance relationship.

 

©ABHISHEK YADAV -2018

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