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जीवन मरीचिका

कुछ अनजान रास्तो पर बिन निशान खोजते हुए चलते जाना ।
चलते जाना जबतक पाँव साथ दे ,
देखते रहना चारो ओर,
जिस तरफ भी रौशनी देखलायी पड़े ।

 

 

कुछ कोहतूल और कुछ संशय लिए अपने दिल में ,
कंधो पर ढोये हुए , अपनी जिम्मेदारियों के बस्ते को ,
और जेब में रखी कुछ चमकीले ख्वाहिसे ,
बस बढ़ते जाना ,
बस चलते जाना है ।

 

 

और जब भी रुक जाना , तब ढह जान खुद पर ,
जब लोट जाना इस ठंडी पथरीली ज़मीन पर ,
तब याद करना , अपने संस्मरणों को,
खगालना अपने कंधे के बस्ते की रौशनी को,
सूंघना अपनी मुड़ी तुड़ी देह को ।

 

 

तब जा कर जो हासिल होगा ये सब गलाने,
जलाने के बाद , उठा लेना वो सब,
क्यों की वो ही सारांश है ,
तुम्हारे और मेरे जीवन का ।

 

 

ये दोस्त , हमारी तुम्हारी यात्रा ही जीवन है ,
ये मंजिल तो बस मरीचिका है |

 

© Abhishek Yadav- 2018

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कालजयी अटल

कालचक्र की अनंत परिधि में सब कोई पीस जाता है ।,
जो काल के कपाल पर अमरबेल बन कर बैठा वो अटल है ।

जो दृष्टि प्रारगम्य हुआ वो तो नश्वर शरीर है,
जो कुछ बचा तुम्हारे मेरे अंत पटल पर वो अटल है ।

स्तब्ध तो मैं भी हु, निशब्द तो मैं भी हूँ, पर जीवन तो चलायमान है,
जीवन धारा में सब गतिशील है , पर अब जो नहीं है वो अटल है ।

कोटि कोटि प्रणाम, दंडवत विदाई ,

©Abhishek Yadav-2018

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सर्दी

नर्म घासो के गद्दे पर, चमकीली ओश की बतलाती थी ,
की रात, तुम हो  ।
टूटी हुई पत्तियों की चुरमुराहट  सुनाती थी ,
तुम्हारे होने का एहसास ।
बासी काली राख, हुआ करती  थी,
तुम्हारे बातो की गवाह ।
और बेतर-बीती से बिखरे प्याले, गरम होते थे ,
तुम्हारे बोसे से ।

 

आज भी  ओश की बारिश होती है ,
आज भी चाय के प्याले सजते है ,
आज भी अलाव की राख पसरती है ,
आज भी पछुआ बहती है ,
और आज भी तारो की बारात सजती है ।

 

पर न जाने क्यों दो लोग उदास होते  , आजकल ,
एक मै और दूसरा बूढ़ा चाँद ,
क्यों की हम दोनों को आज कल ,
आपस में  ही बाते करनी पड़ती है,
बाकि अब क्या कहु तुमसे ,

 

अब तो पहले जैसी ठंडक भी कहा पड़ती है ।

 

© Abhishek Yadav -2017

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मेरी जरुरत है मुझे

लोग आते है , लोग जाते है ,

कभी झुंडो में , कभी अकेले ,

कभी लंबी दूरी के लिए , कभी छड़ भर ,

इन सब संगत, मेल-मिलाप ,आवागमन कुछ साथ रह जाता है तो,

मैं और मेरा साथ |

 

मेरा साथ है जबतक मुझसे  ,

तो इस लोगो के रेलम-रेल , धक्कम-धक्का , अवतरण- गमन ,

इन सब से कुछ नहीं बदलता , और न बदलेगा,

 

तभी तो काट रक्खा है , खुद को; अकांछाओ ,संबंधों ,नातेदारों ,उम्मीदों  और ,

समाज और रिश्तो को मायाजाल से, अगर उलझा, तो खुद को न सुलझा  पाउँगा,

और खुद ही खुद से जुदा होता  जाऊंगा,

 

तभी तो चलते रहना मेरी मज़बूरी , मेरी जरुरत है ,

ठहराव मेरी कमजोरी है , चलो मैं चलता हूँ ,

मेरी जरुरत है मुझे |

© Abhishek Yadav -2017

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मैं चलता हूँ….

आज फिर ख़ुद को बेबस  महसूस करता हूँ,
कल भी कुछ नहीं था ,आज भी कुछ नहीं है ,
फिर भी कारवाँ लूटने से डरता हूँ |

 

मेरी तन्हाई मुझे सोने नहीं देती ,ख्वाबो की गर्माहट ;मुझे रोने नहीं देती ,
काश , मैं भी अपनी बेबसी का ठीकरा दूसरो  के सरो पर फोड़ पाता,
अपनी शिकस्त  को बदनसीबी ठहराह पाता,
पर अफ़सोस है |

 

अपना कारवाँ,  खुद मैंने ही पाया है ,
कुछ छूट,कोई रूठा ,कुछ पाया, कुछ को मनाया ,
किसी का प्यार, किसी की ठुकराई , खुद उलझा, खुद सुलझाया है |

 

अब क्या करू , रुक पाने की मेरी सोहबत नहीं ,
अब तो आदत सी पड़ गयी है , फकीरी में सिकंदर बन मुस्कुराने की ,
चलो चलता  हूँ, बहुत अरमान है चुमकारने को ,
बहुत से बुर्ज बाकि है नाप आने को |

 

© Abhishek Yadav -2017

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सोहबत- संगत,  अरमान- इच्छा, चुमकारने-चूमना, बुर्ज- गुंबद

 

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साल का बही खाता ….

अपने इस साल का खाता लेकर बैठा आज ,
देखने अपना नफा नुकसान ,
देखा बहुत सी यादें मिली अपने आप, कुछ लोग भी गए खुद बा खुद ,
बहुत कुछ जुड़ा मेरी यादों की तिजोरी में,
काफी कुछ घट गया अपने और दोस्ती-यारो में,

 

बहुतो को यादें दी , जो वो अपने साथ ले कर चले गये,
बहुतो से एहसान लिया जो चूका नहीं पाया ,
बहुत सी यादें फस गयी दो दिलो के दरारों में ,
और ,बहुत कुछ मिल गया , अनजाने यारो में ,

 

काफी कुछ उलझा , काफी मैं सुलझा ,
कुछ दोस्त बनाये , कुछ रिश्ते फैलाये,
कुछ यादें सजोयी, कुछ अनुभव पिरोये ,

 

इन सब में मैंने खुद को खोया ,
खुद को पाया , कभी खुद को बेबस,
कभी बेक़रार , कभी निराश ,कभी हताश पाया,
मैंने खुद को साल के बही कहते में बंधा पाया ,

 

फिर देखा नया पन्ना , नया साल ,
फिर मुस्कुराया , और चला हूँ लिखने ,
नयी कहानी , नयी कलम से ,
नयी शुरुवात , नयी किरण से |

 

नया साल आप सभी को मुबारक हो,

© Abhishek Yadav 2016

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मैं इंतज़ार कर रहा हूँ …..

 

इस छितिज के उस पार, और इंद्रधनुष के पहले ,
जहा पर वक़्त की पहुच नहीं है , और दिशा शून्य है ,

उसी जगह जहाँ से सूरज अपनी चमक भरता है,
और रात अपनी काली केचुली उतरती है ,

उसी चट्टान पर , जिसके नीचे तारो की गर्द दबी है,
और जहाँ पर पुरवा हवा आ कर के रुक जाती है,

 

 

ठीक उसी जगह पर ,
जहाँ तुमने मुझे रुकने को बोला था ,
जल्दी आना ,
मैं तुम्हार इंतज़ार कर रहा हूँ,

 

 

© Abhishek Yadav 2016

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मेरा धर्म

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समय के समंदर में ,कुछ पलो के लिए रुक भी जाओ ,

थक चुका मैं, अपनी  नाव खेते,

कुछ सांसो के लिए रुक भी जाओ |

 

सांसे अब उखड गयी , जीवन-नाव खेते ,

किनारा फलक के पार अदृश , दृस्तिविहिन ,

मेरी छमता, मेरी सीमा के पार ,

ऐसे में अब इतना भी मत उकसाओ |

कुछ ऋतुएं भर न सही , पर कुछ पलो के लिए ही ,

मुझे मेरे पास रख जाओ |

 

मुस्कुराई और बोली –

कुछ छड़ो के लिए भी रुक गए तुम ,

तो यही जड़वत हो जाओगे,

भावनाओ ,  अकॉक्षाऔ का बवंडर है ,

स्वप्नों की आँधी है,

उम्मीदों को ओले  है ,

और सम्बन्धो की व्यधि है |

 

रुक गए , तो जकड जाओगे,

पत्थर बनकर धस जाओगे ,

थम गए तो ज्वाला मर जाएगी आत्मा की ,

और, ऊष्मा आलोक हो जाएगी दिवास्वप्नों  की |

 

तुम केवट हो , तुम्हे नाव चलाये रखनी है ,

अपने कर्तव्यों से,

अपने कर्मो से ,

रुकना तुम्हारा धर्म नहीं है |

 

 

और मैं लौट आया ,अपने कर्तव्यों की दुनिया में ,

मेरा धर्म निभाने |

© Abhishek Yadav 2016

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पुस्तैनी घर

बड़ी जद्दोजहद  के बाद , अपनी पुस्तैनी ज़मीं पर पैर रखे ,

कुछ झीज़कते , कुछ हिचकिचाते ,

उन उजड़े , बिखरे , बेतरतीब , छप्परों के नीचे,

अपने कदमो को जमाया |

 

 

सीलन भरी दीवारे और उसकी फीकी पड़ी पुताई ,

जो कभी , किलकारी भरती थी ,

वो रंगीन चबूतरे , लहलाती छज्जे ,

जो कभी सीधी खड़ी रहती थी |

 

 

न जाने क्यों आज वह पर

सड़न कुछ गलने की घुटी घुटी सी हवा भरी है ,

जो आँगन कभी चहल कदमी से भरा रहा करते थे ,

जिनकी शामें गुलजार रहा करती थी ,

जिनके दरवाजों पर , मेरे बुजुर्गो का कहकहा  हुआ करती थी |

 

 

उन दरवाजों  पर मरघट का सन्नाटा है ,

दम घोटू  माहौल सा बना बैठा है ,

मेरी यादें, इस घर से जुडी थी ,

मेरी लोरी की यादें , कहानियों की उड़ाने ,

मिटटी वाले चूल्हे की गर्मी ,भूसे की नरमी ,

ओष की ठंडी बूँद , और वो कुहरे भरी राते ,

और न जाने कौन कौन सी सब की सब ,

कच्ची मेढ़ो की तरह पग-पग बदल कर ,

मेरे संस्मरणों में घुमरने लगी |

 

 

जब तक कुछ बूंदे  मेरी आँखो से लुढक पड़ती ,

मानसून की बारिश बनकर ,

मैंने बंद कर दिए पुराने किवाड़ ,

अपने पुरानी यादो के ,

फिर चिराग बुझा कर , चल दिया ,

अपने जगमगाते , चमकीले , पथरीले  शहर की तरफ ,

जहाँ  मेरी जरूरतें, मेरा इंतज़ार कर रही थी |

 

 

औऱ मैं मुड़ भी गया, औऱ भाग पड़ा ,

न जाने क्यों पीठ दिखा कर |

 

 

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पुरुष

 

शायद  तुमको लगता मै निशब्द , भावहीन , संवेदनहीन ,तर्कविहीन, हाड-मांस  काया , काठ का पुतला,

कुछ उजला, कुछ धुंधला,

संवेदनाये मुझ में भी है ,अभिव्यक्ति मुझे भी आती,

आँखों से खारापन मेरे भी बहता ,जिव्या मेरी भी कुलबुलाती  |

 

 

जीवन मेरा , सीमाये मेरी ,मेरी अभिलाषाएं ,मेरी महत्वाकांक्षये ,

सब की सब , एक दायरे में, एक सीमा में रहती ,शायद ही कभी अपनी मर्यादाओ से आगे बहती  |

 

इच्छाएं कर्मो के आगे रुक जाती,

भावनाएं दायरे में रह जाती,

स्वप्न जिम्मेदारियों में फस जाते,

महत्वाकांक्षये सम्मान से रह जाती  |

 

 

मै अपने बनाये संविधान से ही हारा,

लगता है बन गया बेचारा,

चाह कर मै अपने आप से बहार न आ सकता,

मै बहुत कुछ नहीं कर सकता,

क्यों की मै पुरुष हूँ   |

 

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© Abhishek Yadav 2015

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