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सतरंगी ज़िन्दगी

घनी बदली के बीच, तेज़ चमकीली धुप सी खिल आती तुम,
पर लोगो को निज पास घुमड़ते ; लुक छिप जाती तुम,
देखो देखो , आयी तुम, देखो देखो बिसराई तुम,
कभी काले मेघा , कभी नीले आकाश , सी ,
बदल जाती तुम,
कभी टप टप सी बूंदे बन, मुझ पर ही गिर जाती तुम,
कभी गौरैया सी फुर्र सै नजरो सै ओझल हो जाती तुम,
और कभी सपनो के इंद्रधनुष बनती ,

कभी जीवन के गर्त में ले जाती तुम

तुम कौन हो ?
मैं कौन हूँ?
मेरे होने का कारण क्या है ?
ये सोच बही बतलाती तुम

तुम्हे पता है ज़िन्दगी !
ये सारे तमाशे मुझे ; रोज दिखलाती तुम।

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© Abhishek Yadav -2021

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संदूक

आज भी सुबह के गुलाबी चमकीले बादलों के टुकड़ो को ,
टुकर टुकर देख कर याद आया ,
क्या अजीब सा शौक दे गयी तुम ,
हमारे ख्वाबो के रंगीन , कांच से चमकीले टुकड़ो को,
तुम्हारी गर्माहट में लपेट कर , यादो की संदूक में ,
तह लगा लगा कर रखना।

 

और बीच बीच में खोल कर देखना संदूको को ,
जब लगे खुद की अंदर कुछ कुछ ,
काला, सियाह अँधेरा ,
कमी गुलाबी चमकीली यादों की ।

आज भी तुम्हारी छोड़ी हुई यादो की संदूक रक्खी है,
तुम्हारी मर्ज़ी का भुरभुरा ताला लगा कर ,
अटारी पर दबा कर,

 

मेरी तो ,
हिम्मत ही नहीं पड़ती संदूक कभी खोलने की ,
खुलने पर न जाने कौन सा बदल तुम्हारी यादों का ,
बहार आ जाये , और लगे बरसने ,
मेरी आँखों के कोर से ।

 

बस इतनी गुजारिश है , कभी आ कर ,
इस संदूक को ठिकाने लगाती जाना ।

 

© Abhishek Yadav- 2018

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चाँद का टुकड़ा

कभी चाँद का टुकड़ा हुआ करती थी तुम ,
पर देखो तो आज ,
बस टुकड़ा ही टुकड़ा बचा है ।

चाँद तो मेरा , खो गया है,
अपने ही चकमक उजाले में ।

© Abhishek Yadav -2018

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सर्दी

नर्म घासो के गद्दे पर, चमकीली ओश की बतलाती थी ,
की रात, तुम हो  ।
टूटी हुई पत्तियों की चुरमुराहट  सुनाती थी ,
तुम्हारे होने का एहसास ।
बासी काली राख, हुआ करती  थी,
तुम्हारे बातो की गवाह ।
और बेतर-बीती से बिखरे प्याले, गरम होते थे ,
तुम्हारे बोसे से ।

 

आज भी  ओश की बारिश होती है ,
आज भी चाय के प्याले सजते है ,
आज भी अलाव की राख पसरती है ,
आज भी पछुआ बहती है ,
और आज भी तारो की बारात सजती है ।

 

पर न जाने क्यों दो लोग उदास होते  , आजकल ,
एक मै और दूसरा बूढ़ा चाँद ,
क्यों की हम दोनों को आज कल ,
आपस में  ही बाते करनी पड़ती है,
बाकि अब क्या कहु तुमसे ,

 

अब तो पहले जैसी ठंडक भी कहा पड़ती है ।

 

© Abhishek Yadav -2017

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आ जाओ फिर तुम

कुछ  गहरी खाईया खोद रही है हम दोनों ने अपने दरमियान ,
जबकि फासला सिर्फ कुछ बोलो ,कुछ बून्द आँसुओ भर का है,
बेबसी तुमको भी है , बेक़रार मैं भी हूँ,
हया की दलदल में तुम भी हो,
जस्बातो के बवंडर में लड़खड़ाता  मैं भी हूँ |

 

न जाने कब हम बोलेगे , गांठ अपने दिलो की खोलेंगे ,
पहल का इंतज़ार मुझको भी है ,
और मुझ से बेक़रार तुम भी हो ,
कनखियों से ताकना मैंने भी देखा है,
नज़रे चुराके निहारना ,तुम ने भी पकड़ा है,

 

ये लुकाछिपी ,
ये अंतहीन पहले खेल,
मुझ से मैं को न हटा पाना , न जाने कहा तक
हम दोनों को ले जायेगा |

 

पर मैं , ज़िन्दगी भर तिलमिलाने , खुद ही खुद में बिलबिलाने ,
कब्र तक की बेबसी , खुद ही खुद में बुदबुदाने ,
वज़नों को सीने पर ढ़ोने से बेहतर ,
मैं कहता हूँ ,
आ जाओ फिर तुम , बस और नहीं  |

 

 

© Abhishek Yadav 2017

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अक्शो का तिलिश्म

रो सकते तो क्या सुकून होता दिल को ,
इस तरह सरे आम , लिख कर ,
जस्बातो की नुमाईश न करनी पड़ती ,

 

बड़े किस्मत वाले है वो ,
रखते है दरिया-ए-अक्श,
यु पत्थर-दिल कहला कर,
रुसवाई हासिल न करनी पड़ती ,

 

गर पहले  समझ जाता इन अक्शो का तिलिश्म ,
तो  रुसवाई यार की सहनी न पड़ती ,
वक़्त पर कर लेता  कागज पर बंद , अपनी बेबसी का नाच ऐ,
मुहब्बत अपनी , रुसवा  न करनी  पड़ती  |

 

© Abhishek Yadav 2017
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जुग़नू

खवाब भी मेरे थे ,मंजिल भी मेरी थी,
तुम आये तो ज़िन्दगी में रोशनी सी थी,
समझ न सका साथ जुग़नू का ,
जब रोशन मेरी मंजिल थी |

 

कदर न कर सका रौशनी का , जो साथ थी मेरे ,
हवश में था , चाँद के रौशनी में मैं तो ,
वो तो चाँद था , छुप गया , बादलों में तो,
ना तो चाँद मिला , ना मंजिल मेरी |

 

बेहया सा अब , जुग़नू की तलाश करता हूँ,
सीने में जस्प *कर लूंगा , आ मिल तो  मुझे |
जस्प*- अवशोषित  (absorve)

 

© Abhishek Yadav -2017
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मैं तुम्हारे साथ हूँ

आगे चलो ,
क्यों की , पीछे सिर्फ इतिहास बैठा है ,
कुछ लोग, कुछ बाते,कुछ कड़वी, कुछ मीठी यादें,
ये सब बीते वक़्त की यादें है ,जो दब रही है वक़्त के गर्त में |

 

छोड़ दो, इन गर्दो को, उड़ जाने दो ,
मलबे से गुम्बदे तामील नहीं होती ,
टूटे आईने में शकले नहीं दिखती ,
फूटे प्याले की दरारें, कभी नहीं भरती ,
इन बीते यादों, से बच जाता है तो सिर्फ ,
मायूस,बेबस , जिरह खारदार यादों की ,

 

 

आओ आगे, मेरे साथ , फिर से मिल कर ,
ताना-बाना,बुनेगें आने वाले वक़्त का ,
खाका खीचेंगे उजले मुस्तकबिल का ,
तुम एक कदम भरो तो सही ,
मैं तुम्हारे साथ हूँ |

 

तामील- अमल, जिरह- पूछताछ , खारदार- काँटेदार, मुस्तकबिल- भविष्यकाल

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धुंधले साये

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कोहरे की घनी दिवार के पीछे के ; धुँदले साये ,
कभी आना मेरे पास ,बड़ी शिद्दत से इंतज़ार है ,
तुम्हारे दीदार का |

 

बेपनाह बेबसी है ,तुम्हारे दीदार की ,
कुर्बान की है नींदे,रंगीन सपने देख कर न जाने कितनी रातें की ,
गुलाबी रेत पर अनगिनतों खाका खींचा ; तुम्हारी शक्ल की  |

 

आ जाओ मेरे पास ,बिन झिझक, बिन हिचक के ,
अपने कदमो को आज़ाद कर के,
मेरे पास बिन देर किये |

 

 

या फिर अशआर बता दो मुझे ,
मेरे धुंधले ख्वाबो के पार जाकर,
तुम्हे आगोश में भरने का |

 

© Abhishek Yadav-2017

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शिद्दत – प्रबलता,  दीदार- साक्षात्कार,  अशआर-रहस्य

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मैं चलता हूँ….

आज फिर ख़ुद को बेबस  महसूस करता हूँ,
कल भी कुछ नहीं था ,आज भी कुछ नहीं है ,
फिर भी कारवाँ लूटने से डरता हूँ |

 

मेरी तन्हाई मुझे सोने नहीं देती ,ख्वाबो की गर्माहट ;मुझे रोने नहीं देती ,
काश , मैं भी अपनी बेबसी का ठीकरा दूसरो  के सरो पर फोड़ पाता,
अपनी शिकस्त  को बदनसीबी ठहराह पाता,
पर अफ़सोस है |

 

अपना कारवाँ,  खुद मैंने ही पाया है ,
कुछ छूट,कोई रूठा ,कुछ पाया, कुछ को मनाया ,
किसी का प्यार, किसी की ठुकराई , खुद उलझा, खुद सुलझाया है |

 

अब क्या करू , रुक पाने की मेरी सोहबत नहीं ,
अब तो आदत सी पड़ गयी है , फकीरी में सिकंदर बन मुस्कुराने की ,
चलो चलता  हूँ, बहुत अरमान है चुमकारने को ,
बहुत से बुर्ज बाकि है नाप आने को |

 

© Abhishek Yadav -2017

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सोहबत- संगत,  अरमान- इच्छा, चुमकारने-चूमना, बुर्ज- गुंबद