Hindi

पनोती

कुछ तो बात होगी तुम में ,
हज़ारो शमा के बीच में रहकर भी ,
तुम्हारी रौशनी की यादें, आज भी चटकती है,
सुनहरी रेत आज भी , आँखों के कतरे से बहती है ,
पर चुभती नहीं है ।

 

 

खास तो है तुम में ,की मेरे यादो के भवर के ,
बीचो बीच में तुम हो ,
यु ही इश्क़बाज़ी, का समंदर आ कर तुम पर सूख गया |

 

 

ऐसी ही बाते , बहुत सी, बतलानी, समझनी थी तुम को,
पर तुम तो जानती हो ,
निगाहे मेरी ठहरी पनोती,
लग गयी मुझको ,
जिस रोज तुम्हे आँखो में बिठा के आईना देखा था ।

 

 

अब क्या कहुँ, जाते जाते ;
जरा अपनी यादों के कसक की दवा बताती जाना ,
बड़ी टीस मचती है अकेलेपन में ।

 

© Abhishek Yadav- 2018

www.google.co.in

 

Advertisements
Hindi

प्रतिकर्षण

अंतर पड़ता है ,जब सूरज चमकता है , और मंद हो जाता है ।
जब चाँद रौशनी देता है , और जब छुप जाता है ।
हवाओ के होने और न होने पर कमी महसूस होती है ।
जब कुछ भी बदलता है , हमारे चारो ओर,
तब कमी साफ साफ दिखती है ।

 

 

मेरी, और तुम्हारी ,और हम सबकी आदत है ,
अपने लोगो को इतना अपना मान लेने की ,
वो हमसाया सा ,बन जाते है , हमारे लिए  |

 

 

पर ; साये की की कमी महसूस होती है ,
अपनी घुउप अँधेरी रात में;
जब आप और आप की सासों के दर्मया कोई भी नहीं होता ।

 

 

गलती मेरी थी, की तुम्हे इतना माना , की “खुद आप” ही समझ बैठे,
पर अफ़सोस ये भूल बैठे की , ज्यादा नज़दीकिया ,
धकेलती भी है एक दूसरे दूर , कभी कभी काफी दूर तक।

 

 

तुम ही देख लो तुम्हारे “प्रतिकर्षण” का नतीजा ,
आज हम सिर्फ एक दूसरे को दूर से देख सकते है ,
क्यों की एक शांत नदी बह रही है हमारे बीच ।

 

©Abhishek Yadav -2018

Image Sourcewww. google.com

Hindi

अनंत  की ओर

कुछ नहीं ,क्या और कहे ;
बस ख़ामोशी है , जो बोल रही है ।

 

हजारो की भीड़ है मेरे चारो ओर, फिर भी कुछ दूरी है;
जो बन रखी है, दरम्यान मेरे और लोगो के ।
कुछ है भी नहीं मेरे और उन लोगो के बीच ,
फिर भी खइया खुदी पड़ी है ; मेरे और लोगो के बीच ,
बे बेबस सा खड़ा खुद को देखता सा रहता हूँ।

 

न जाने क्यों ऐसे हालत बन गए है, की
वीराना भी फुसफुसाता से सुनाइए पड़ता है ,
शायद कुछ कुछ चुगलियाँ सा महसूस होता है ।

 

 

बहुत कुछ धुंधला ; सिला सिला सा घूमता है ;
मेरे चारो ओर , कुछ घुटन सा भरा ।

 

बस एक साथ है जो मेरे वो , मेरी धड़कने है ,
बस ताल बजाती ज़िन्दगी की ,
कुछ नज़्मे सुनती रोशनी की ,

 

बस इसी रौशनी के डोर लेकर चलना है ,
और चलते जाना है , अपना सहारा खुद बन कर ,
न किसी के लिए , न किसी को ले कर ,
बस आगे खुद को किये ।

 

बस एक यात्रा करनी है ,
खुद से खुद की ,
खुद से खुद के लिए ,
बस चलना है ,
अनंत  की ओर |

 

© Abhishek Yadav- 2018

Image source www.google.com

Hindi

जीवन मरीचिका

कुछ अनजान रास्तो पर बिन निशान खोजते हुए चलते जाना ।
चलते जाना जबतक पाँव साथ दे ,
देखते रहना चारो ओर,
जिस तरफ भी रौशनी देखलायी पड़े ।

 

 

कुछ कोहतूल और कुछ संशय लिए अपने दिल में ,
कंधो पर ढोये हुए , अपनी जिम्मेदारियों के बस्ते को ,
और जेब में रखी कुछ चमकीले ख्वाहिसे ,
बस बढ़ते जाना ,
बस चलते जाना है ।

 

 

और जब भी रुक जाना , तब ढह जान खुद पर ,
जब लोट जाना इस ठंडी पथरीली ज़मीन पर ,
तब याद करना , अपने संस्मरणों को,
खगालना अपने कंधे के बस्ते की रौशनी को,
सूंघना अपनी मुड़ी तुड़ी देह को ।

 

 

तब जा कर जो हासिल होगा ये सब गलाने,
जलाने के बाद , उठा लेना वो सब,
क्यों की वो ही सारांश है ,
तुम्हारे और मेरे जीवन का ।

 

 

ये दोस्त , हमारी तुम्हारी यात्रा ही जीवन है ,
ये मंजिल तो बस मरीचिका है |

 

© Abhishek Yadav- 2018

Image Source- www.google.co.in

Hindi

कालजयी अटल

कालचक्र की अनंत परिधि में सब कोई पीस जाता है ।,
जो काल के कपाल पर अमरबेल बन कर बैठा वो अटल है ।

जो दृष्टि प्रारगम्य हुआ वो तो नश्वर शरीर है,
जो कुछ बचा तुम्हारे मेरे अंत पटल पर वो अटल है ।

स्तब्ध तो मैं भी हु, निशब्द तो मैं भी हूँ, पर जीवन तो चलायमान है,
जीवन धारा में सब गतिशील है , पर अब जो नहीं है वो अटल है ।

कोटि कोटि प्रणाम, दंडवत विदाई ,

©Abhishek Yadav-2018

Hindi

अनकही बाते…..

आज रात भर चाँद को देख कर रात गुजारी ,

न जाने क्यों , अजीब सा दिल था ?

रात तो काली थी पर बहार  बिखरा दूधिया उजाला था ,

हवाओ में सिहरन थी , और

ओश पिघली, सरकती सी बाह रही थी ,

कनपटी से ।

चारो ओर सनाटा था ,

 

बस जो धधक रही थी ,मेरे सीने में ,

एक बेबसी थी , अपने सपनो को पिघलता देख,

अपनी चाहते को, टूटी पत्तियों में दबता देख ,

और , जब न सह सका कड़कड़ाती ठण्ड ।

तो  अलाव जला ली, अपने सतरंगी वादों की ,

और  ऊंची ऊंची लपटों  में  अर्पित कर दी दमकती परछाइयाँ |

 

अब ,सुबह बस बची है ,बस चमकीली राख ,

सोचता हूँ ,की कहाँ ठिकाने लगाऊ अपनी,

 

इन अनकही बातो का  ?

© Abhishek Yadav 2017

Image source- Google

Hindi

सर्दी

नर्म घासो के गद्दे पर, चमकीली ओश की बतलाती थी ,
की रात, तुम हो  ।
टूटी हुई पत्तियों की चुरमुराहट  सुनाती थी ,
तुम्हारे होने का एहसास ।
बासी काली राख, हुआ करती  थी,
तुम्हारे बातो की गवाह ।
और बेतर-बीती से बिखरे प्याले, गरम होते थे ,
तुम्हारे बोसे से ।

 

आज भी  ओश की बारिश होती है ,
आज भी चाय के प्याले सजते है ,
आज भी अलाव की राख पसरती है ,
आज भी पछुआ बहती है ,
और आज भी तारो की बारात सजती है ।

 

पर न जाने क्यों दो लोग उदास होते  , आजकल ,
एक मै और दूसरा बूढ़ा चाँद ,
क्यों की हम दोनों को आज कल ,
आपस में  ही बाते करनी पड़ती है,
बाकि अब क्या कहु तुमसे ,

 

अब तो पहले जैसी ठंडक भी कहा पड़ती है ।

 

© Abhishek Yadav -2017

Image Source- www.google.co.in

Hindi

आ जाओ फिर तुम

कुछ  गहरी खाईया खोद रही है हम दोनों ने अपने दरमियान ,
जबकि फासला सिर्फ कुछ बोलो ,कुछ बून्द आँसुओ भर का है,
बेबसी तुमको भी है , बेक़रार मैं भी हूँ,
हया की दलदल में तुम भी हो,
जस्बातो के बवंडर में लड़खड़ाता  मैं भी हूँ |

 

न जाने कब हम बोलेगे , गांठ अपने दिलो की खोलेंगे ,
पहल का इंतज़ार मुझको भी है ,
और मुझ से बेक़रार तुम भी हो ,
कनखियों से ताकना मैंने भी देखा है,
नज़रे चुराके निहारना ,तुम ने भी पकड़ा है,

 

ये लुकाछिपी ,
ये अंतहीन पहले खेल,
मुझ से मैं को न हटा पाना , न जाने कहा तक
हम दोनों को ले जायेगा |

 

पर मैं , ज़िन्दगी भर तिलमिलाने , खुद ही खुद में बिलबिलाने ,
कब्र तक की बेबसी , खुद ही खुद में बुदबुदाने ,
वज़नों को सीने पर ढ़ोने से बेहतर ,
मैं कहता हूँ ,
आ जाओ फिर तुम , बस और नहीं  |

 

 

© Abhishek Yadav 2017

Image Source – www.google.co.in

Hindi

अक्शो का तिलिश्म

रो सकते तो क्या सुकून होता दिल को ,
इस तरह सरे आम , लिख कर ,
जस्बातो की नुमाईश न करनी पड़ती ,

 

बड़े किस्मत वाले है वो ,
रखते है दरिया-ए-अक्श,
यु पत्थर-दिल कहला कर,
रुसवाई हासिल न करनी पड़ती ,

 

गर पहले  समझ जाता इन अक्शो का तिलिश्म ,
तो  रुसवाई यार की सहनी न पड़ती ,
वक़्त पर कर लेता  कागज पर बंद , अपनी बेबसी का नाच ऐ,
मुहब्बत अपनी , रुसवा  न करनी  पड़ती  |

 

© Abhishek Yadav 2017
image source – www.google.co.in
Hindi

जुग़नू

खवाब भी मेरे थे ,मंजिल भी मेरी थी,
तुम आये तो ज़िन्दगी में रोशनी सी थी,
समझ न सका साथ जुग़नू का ,
जब रोशन मेरी मंजिल थी |

 

कदर न कर सका रौशनी का , जो साथ थी मेरे ,
हवश में था , चाँद के रौशनी में मैं तो ,
वो तो चाँद था , छुप गया , बादलों में तो,
ना तो चाँद मिला , ना मंजिल मेरी |

 

बेहया सा अब , जुग़नू की तलाश करता हूँ,
सीने में जस्प *कर लूंगा , आ मिल तो  मुझे |
जस्प*- अवशोषित  (absorve)

 

© Abhishek Yadav -2017
image source – www.google.co.in