Hindi

सर्दी

नर्म घासो के गद्दे पर, चमकीली ओश की बतलाती थी ,
की रात, तुम हो  ।
टूटी हुई पत्तियों की चुरमुराहट  सुनाती थी ,
तुम्हारे होने का एहसास ।
बासी काली राख, हुआ करती  थी,
तुम्हारे बातो की गवाह ।
और बेतर-बीती से बिखरे प्याले, गरम होते थे ,
तुम्हारे बोसे से ।

 

आज भी  ओश की बारिश होती है ,
आज भी चाय के प्याले सजते है ,
आज भी अलाव की राख पसरती है ,
आज भी पछुआ बहती है ,
और आज भी तारो की बारात सजती है ।

 

पर न जाने क्यों दो लोग उदास होते  , आजकल ,
एक मै और दूसरा बूढ़ा चाँद ,
क्यों की हम दोनों को आज कल ,
आपस में  ही बाते करनी पड़ती है,
बाकि अब क्या कहु तुमसे ,

 

अब तो पहले जैसी ठंडक भी कहा पड़ती है ।

 

© Abhishek Yadav -2017

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Hindi

I am in desert

Far from here, where I can’t reach.
In unknown location extreme from sight,
A site where no direction,
 A position without  dimension
I know you are there,

 

Because I live in desert
Far from emotions and feeling,
Dry and dusty place like my heart,
Soil without pulse and carving,

 

At this land, i suspect,
Moister, muggier, cold and breeze,
 Downpour, cascade, around and within me,
Same salty, same soaked, same savour.

 

Stop your droplets, stop moan,
I can’t bear breeze, that much feeling in my head,
Because now I live in the desert , My Love.

 

 

© Abhishek Yadav- 2017

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