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अनंत  की ओर

कुछ नहीं ,क्या और कहे ;
बस ख़ामोशी है , जो बोल रही है ।

 

हजारो की भीड़ है मेरे चारो ओर, फिर भी कुछ दूरी है;
जो बन रखी है, दरम्यान मेरे और लोगो के ।
कुछ है भी नहीं मेरे और उन लोगो के बीच ,
फिर भी खइया खुदी पड़ी है ; मेरे और लोगो के बीच ,
बे बेबस सा खड़ा खुद को देखता सा रहता हूँ।

 

न जाने क्यों ऐसे हालत बन गए है, की
वीराना भी फुसफुसाता से सुनाइए पड़ता है ,
शायद कुछ कुछ चुगलियाँ सा महसूस होता है ।

 

 

बहुत कुछ धुंधला ; सिला सिला सा घूमता है ;
मेरे चारो ओर , कुछ घुटन सा भरा ।

 

बस एक साथ है जो मेरे वो , मेरी धड़कने है ,
बस ताल बजाती ज़िन्दगी की ,
कुछ नज़्मे सुनती रोशनी की ,

 

बस इसी रौशनी के डोर लेकर चलना है ,
और चलते जाना है , अपना सहारा खुद बन कर ,
न किसी के लिए , न किसी को ले कर ,
बस आगे खुद को किये ।

 

बस एक यात्रा करनी है ,
खुद से खुद की ,
खुद से खुद के लिए ,
बस चलना है ,
अनंत  की ओर |

 

© Abhishek Yadav- 2018

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