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अनंत  की ओर

कुछ नहीं ,क्या और कहे ;
बस ख़ामोशी है , जो बोल रही है ।

 

हजारो की भीड़ है मेरे चारो ओर, फिर भी कुछ दूरी है;
जो बन रखी है, दरम्यान मेरे और लोगो के ।
कुछ है भी नहीं मेरे और उन लोगो के बीच ,
फिर भी खइया खुदी पड़ी है ; मेरे और लोगो के बीच ,
बे बेबस सा खड़ा खुद को देखता सा रहता हूँ।

 

न जाने क्यों ऐसे हालत बन गए है, की
वीराना भी फुसफुसाता से सुनाइए पड़ता है ,
शायद कुछ कुछ चुगलियाँ सा महसूस होता है ।

 

 

बहुत कुछ धुंधला ; सिला सिला सा घूमता है ;
मेरे चारो ओर , कुछ घुटन सा भरा ।

 

बस एक साथ है जो मेरे वो , मेरी धड़कने है ,
बस ताल बजाती ज़िन्दगी की ,
कुछ नज़्मे सुनती रोशनी की ,

 

बस इसी रौशनी के डोर लेकर चलना है ,
और चलते जाना है , अपना सहारा खुद बन कर ,
न किसी के लिए , न किसी को ले कर ,
बस आगे खुद को किये ।

 

बस एक यात्रा करनी है ,
खुद से खुद की ,
खुद से खुद के लिए ,
बस चलना है ,
अनंत  की ओर |

 

© Abhishek Yadav- 2018

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जीवन मरीचिका

कुछ अनजान रास्तो पर बिन निशान खोजते हुए चलते जाना ।
चलते जाना जबतक पाँव साथ दे ,
देखते रहना चारो ओर,
जिस तरफ भी रौशनी देखलायी पड़े ।

 

 

कुछ कोहतूल और कुछ संशय लिए अपने दिल में ,
कंधो पर ढोये हुए , अपनी जिम्मेदारियों के बस्ते को ,
और जेब में रखी कुछ चमकीले ख्वाहिसे ,
बस बढ़ते जाना ,
बस चलते जाना है ।

 

 

और जब भी रुक जाना , तब ढह जान खुद पर ,
जब लोट जाना इस ठंडी पथरीली ज़मीन पर ,
तब याद करना , अपने संस्मरणों को,
खगालना अपने कंधे के बस्ते की रौशनी को,
सूंघना अपनी मुड़ी तुड़ी देह को ।

 

 

तब जा कर जो हासिल होगा ये सब गलाने,
जलाने के बाद , उठा लेना वो सब,
क्यों की वो ही सारांश है ,
तुम्हारे और मेरे जीवन का ।

 

 

ये दोस्त , हमारी तुम्हारी यात्रा ही जीवन है ,
ये मंजिल तो बस मरीचिका है |

 

© Abhishek Yadav- 2018

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मेरा धर्म

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समय के समंदर में ,कुछ पलो के लिए रुक भी जाओ ,

थक चुका मैं, अपनी  नाव खेते,

कुछ सांसो के लिए रुक भी जाओ |

 

सांसे अब उखड गयी , जीवन-नाव खेते ,

किनारा फलक के पार अदृश , दृस्तिविहिन ,

मेरी छमता, मेरी सीमा के पार ,

ऐसे में अब इतना भी मत उकसाओ |

कुछ ऋतुएं भर न सही , पर कुछ पलो के लिए ही ,

मुझे मेरे पास रख जाओ |

 

मुस्कुराई और बोली –

कुछ छड़ो के लिए भी रुक गए तुम ,

तो यही जड़वत हो जाओगे,

भावनाओ ,  अकॉक्षाऔ का बवंडर है ,

स्वप्नों की आँधी है,

उम्मीदों को ओले  है ,

और सम्बन्धो की व्यधि है |

 

रुक गए , तो जकड जाओगे,

पत्थर बनकर धस जाओगे ,

थम गए तो ज्वाला मर जाएगी आत्मा की ,

और, ऊष्मा आलोक हो जाएगी दिवास्वप्नों  की |

 

तुम केवट हो , तुम्हे नाव चलाये रखनी है ,

अपने कर्तव्यों से,

अपने कर्मो से ,

रुकना तुम्हारा धर्म नहीं है |

 

 

और मैं लौट आया ,अपने कर्तव्यों की दुनिया में ,

मेरा धर्म निभाने |

© Abhishek Yadav 2016

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मैं ही हूं अश्वथामा

 

 

जीवन के उत्थान पतन में,अंतहीन अनगिनत,पड़ाव कल्पियत हुए ,

बहुत सी मंज़िले आई बहुत से मील पत्थर आये,

बहुत कुछ पाया जीवन के छितिज पर,

बहुत कुछ गवाया इसी धरा पर ।

 

पर फिर भी न जाने क्यों न कोई हर्ष है जीवन उद्देश् को पाने का,

न कोई करुणा है, जीवन- तिरस्कार का,

सांसो में ये सारे स्याह रंग, विस्मित घ्वनियां इस कदर घुल गयी ,

की   प्रत्यछ ,अप्रत्यछ  महत्वहीन हो गए |

 

 

जय पराजय का मूल्य नहीं रहा,

दर्शन और अनुराग में अंतर परिलक्षित नही ,

हर्ष ,करुणा , मर्म, जिज्ञासा,ममता, काम, जुगुप्सा ,

सब एक वर्ण से हो चुके है।

 

क्या है,क्या हो रहा है,

और कौन सी योनि  में कायकल्पित होता जा रहा हूं,

कोई ज्ञान नहीं।

 

 

जीवन संज्ञा शून्य, अंतहीन, अकल्पित, अथाह

गति से,बढ़ता जा रहा है,

और मैं वैरागी, उदासहीन, निर्मोही खुद से दूर हुआ जा रहा हूं।

पता नहीं शून्य में ,त्रिशंकु  सा आज भी वही खड़ा हूं,

जहाँ योजनो पूर्व स्थित था,

मेरे लिये काल में कुछ नहीं बदला, मेरे लिए कल ने कुछ नहीं बदला,

 

 

क्योंकी शायद,

मैं ही हूं अश्वथामा।

 

 

 

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© Abhishek Yadav 2016

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