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  मेरी भाषा…मेरी भावना….

आ जाओ फिर तुम

कुछ  गहरी खाईया खोद रही है हम दोनों ने अपने दरमियान ,
जबकि फासला सिर्फ कुछ बोलो ,कुछ बून्द आँसुओ भर का है,
बेबसी तुमको भी है , बेक़रार मैं भी हूँ,
हया की दलदल में तुम भी हो,
जस्बातो के बवंडर में लड़खड़ाता  मैं भी हूँ |
न जाने कब हम बोलेगे , गांठ अपने दिलो की खोलेंगे ,
पहल का इंतज़ार मुझको भी है ,
और मुझ से बेक़रार तुम भी हो ,
कनखियों से ताकना मैंने भी देखा है,
नज़रे चुराके निहारना ,तुम ने भी पकड़ा है,
ये लुकाछिपी ,
ये अंतहीन पहले खेल,
मुझ से मैं को न हटा पाना , न जाने कहा तक
हम दोनों को ले जायेगा |
पर मैं , ज़िन्दगी भर तिलमिलाने , खुद ही खुद में बिलबिलाने ,
कब्र तक की बेबसी , खुद ही खुद में बुदबुदाने ,
वज़नों को सीने पर ढ़ोने से बेहतर ,
मैं कहता हूँ ,
आ जाओ फिर तुम , बस और नहीं  |

© Abhishek Yadav 2017

 

अक्शो का तिलिश्म

रो सकते तो क्या सुकून होता दिल को ,
इस तरह सरे आम , लिख कर ,
जस्बातो की नुमाईश न करनी पड़ती ,
बड़े किस्मत वाले है वो ,
रखते है दरिया-ए-अक्श,
यु पत्थर-दिल कहला कर,
रुसवाई हासिल न करनी पड़ती ,
गर पहले  समझ जाता इन अक्शो का तिलिश्म ,
तो  रुसवाई यार की सहनी न पड़ती ,
वक़्त पर कर लेता  कागज पर बंद , अपनी बेबसी का नाच ऐ,
मुहब्बत अपनी , रुसवा  न करनी  पड़ती  |

© Abhishek Yadav 2017

मैं तुम्हारे साथ हूँ

आगे चलो ,
क्यों की , पीछे सिर्फ इतिहास बैठा है ,
कुछ लोग, कुछ बाते,कुछ कड़वी, कुछ मीठी यादें,
ये सब बीते वक़्त की यादें है ,जो दब रही है वक़्त के गर्त में |
छोड़ दो, इन गर्दो को, उड़ जाने दो ,
मलबे से गुम्बदे तामील नहीं होती ,
टूटे आईने में शकले नहीं दिखती ,
फूटे प्याले की दरारें, कभी नहीं भरती ,
इन बीते यादों, से बच जाता है तो सिर्फ ,
मायूस,बेबस , जिरह खारदार यादों की ,
आओ आगे, मेरे साथ , फिर से मिल कर ,
ताना-बाना,बुनेगें आने वाले वक़्त का ,
खाका खीचेंगे उजले मुस्तकबिल का ,
तुम एक कदम भरो तो सही ,
मैं तुम्हारे साथ हूँ |

© Abhishek Yadav -2017

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तामील- अमल, जिरह- पूछताछ , खारदार- काँटेदार, मुस्तकबिल- भविष्यकाल

चलो चलता हूँ

आज फिर ख़ुद को बेबस  महसूस करता हूँ,
कल भी कुछ नहीं था ,आज भी कुछ नहीं है ,
फिर भी कारवाँ लूटने से डरता हूँ |
मेरी तन्हाई मुझे सोने नहीं देती ,ख्वाबो की गर्माहट ;मुझे रोने नहीं देती ,
काश , मैं भी अपनी बेबसी का ठीकरा दूसरो  के सरो पर फोड़ पाता,
अपनी शिकस्त  को बदनसीबी ठहराह पाता,
पर अफ़सोस है |
अपना कारवाँ,  खुद मैंने ही पाया है ,
कुछ छूट,कोई रूठा ,कुछ पाया, कुछ को मनाया ,
किसी का प्यार, किसी की ठुकराई , खुद उलझा, खुद सुलझाया है |
अब क्या करू , रुक पाने की मेरी सोहबत नहीं ,
अब तो आदत सी पड़ गयी है , फकीरी में सिकंदर बन मुस्कुराने की ,
चलो चलता  हूँ, बहुत अरमान है चुमकारने को ,
बहुत से बुर्ज बाकि है नाप आने को |

© Abhishek Yadav -2017

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सोहबत- संगत,  अरमान- इच्छा, चुमकारने-चूमना, बुर्ज- गुंबद

 

हमारे ख्वाब

 

ख्वाब जो कुछ हम  ने देखे थे ,

तुम्हारे  लिए , मेरे लिए , और हमारे लिए ,

अब तो बस उनके लहूलुहान ,कसमसाते ,चूरे बचे है ,

मैने ढेर लगा कर रखे है , मेरी यादो के आँगन में ,

कभी आ जाना फुरसत में , अपने अपने ख्वाब छाट लेंगे ,

तुम अपने ख्वाब छाट  लेना , मैं अपने ख्वाब छाट  लूंगा,

और अपने साँजे ख्वाबो की होली जला देंगे,

की कही कोई गुंजाइश , न बचे ,

ख्वाबो के पनपने और लहलहाने की |

 

साल का बही खाता

अपने इस साल का खाता लेकर बैठा आज ,
देखने अपना नफा नुकसान ,
देखा बहुत सी यादें मिली अपने आप, कुछ लोग भी गए खुद बा खुद ,
बहुत कुछ जुड़ा मेरी यादों की तिजोरी में,
काफी कुछ घट गया अपने और दोस्ती-यारो में,

बहुतो को यादें दी , जो वो अपने साथ ले कर चले गये,
बहुतो से एहसान लिया जो चूका नहीं पाया ,
बहुत सी यादें फस गयी दो दिलो के दरारों में ,
और ,बहुत कुछ मिल गया , अनजाने यारो में ,

काफी कुछ उलझा , काफी मैं सुलझा ,
कुछ दोस्त बनाये , कुछ रिश्ते फैलाये,
कुछ यादें सजोयी, कुछ अनुभव पिरोये ,

इन सब में मैंने खुद को खोया ,
खुद को पाया , कभी खुद को बेबस,
कभी बेक़रार , कभी निराश ,कभी हताश पाया,
मैंने खुद को साल के बही कहते में बंधा पाया ,

फिर देखा नया पन्ना , नया साल ,
फिर मुस्कुराया , और चला हूँ लिखने ,
नयी कहानी , नयी कलम से ,
नयी शुरुवात , नयी किरण से |

नया साल आप सभी को मुबारक हो,

© Abhishek Yadav 2016

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मेरा धर्म

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समय के समंदर में ,कुछ पलो के लिए रुक भी जाओ ,

थक चुका मैं, अपनी  नाव खेते,

कुछ सांसो के लिए रुक भी जाओ |

सांसे अब उखड गयी , जीवन-नाव खेते ,

किनारा फलक के पार अदृश , दृस्तिविहिन ,

मेरी छमता, मेरी सीमा के पार ,

ऐसे में अब इतना भी मत उकसाओ |

कुछ ऋतुएं भर न सही , पर कुछ पलो के लिए ही ,

मुझे मेरे पास रख जाओ |

मुस्कुराई और बोली –

कुछ छड़ो के लिए भी रुक गए तुम ,

तो यही जड़वत हो जाओगे,

भावनाओ ,  अकॉक्षाऔ का बवंडर है ,

स्वप्नों की आँधी है,

उम्मीदों को ओले  है ,

और सम्बन्धो की व्यधि है |

रुक गए , तो जकड जाओगे,

पत्थर बनकर धस जाओगे ,

थम गए तो ज्वाला मर जाएगी आत्मा की ,

और, ऊष्मा आलोक हो जाएगी दिवास्वप्नों  की |

तुम केवट हो , तुम्हे नाव चलाये रखनी है ,

अपने कर्तव्यों से,

अपने कर्मो से ,

रुकना तुम्हारा धर्म नहीं है |

और मैं लौट आया ,अपने कर्तव्यों की दुनिया में ,

मेरा धर्म निभाने |

बरस लो आज

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ज़माने दो मुझे जड़ें, तुम्हारी यादो की क्यारियों में ,

बड़ी मस्सकत , बड़ी मुद्दतो के बाद ,

नमी बिखरी है , तुम्हारी आँखों में |

बह जाने दो , छोरो से अविरल प्रवाह ,

और सींचने दो अपनी कुम्हलाई काया ,

जन्मों की मिन्नतों की बाद ,

भावनाओ के बादल घुमड़े है ,

तुम्हारे बंज़र सीने में |

आज मौका है ,

मुझ बागवान को रोपने का बीज,

प्रेम का , इस बंज़र दिल में ,

दिल खोल कर बरसना ,

झूम – झूम कर बरसना ,

बंधन तोड़ कर बरसना ,

कल को  शायद न बीज हो,

न ही बादल बरसे ,

या फिर बागवान ही न हो |

इस लिए बरस लो आज , जी भर के |

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मैं ही हूं अश्वथामा

जीवन के उत्थान पतन में,अंतहीन अनगिनत,पड़ाव कल्पियत हुए ,

बहुत सी मंज़िले आई बहुत से मील पत्थर आये,

बहुत कुछ पाया जीवन के छितिज पर,

बहुत कुछ गवाया इसी धरा पर ।

पर फिर भी न जाने क्यों न कोई हर्ष है जीवन उद्देश् को पाने का,

न कोई करुणा है, जीवन- तिरस्कार का,

सांसो में ये सारे स्याह रंग, विस्मित घ्वनियां इस कदर घुल गयी ,

की   प्रत्यछ ,अप्रत्यछ  महत्वहीन हो गए |

जय पराजय का मूल्य नहीं रहा,

दर्शन और अनुराग में अंतर परिलक्षित नही ,

हर्ष ,करुणा , मर्म, जिज्ञासा,ममता, काम, जुगुप्सा ,

सब एक वर्ण से हो चुके है।

क्या है,क्या हो रहा है,

और कौन सी योनि  में कायकल्पित होता जा रहा हूं,

कोई ज्ञान नहीं।

जीवन संज्ञा शून्य, अंतहीन, अकल्पित, अथाह

गति से,बढ़ता जा रहा है,

और मैं वैरागी, उदासहीन, निर्मोही खुद से दूर हुआ जा रहा हूं।

पता नहीं शून्य में ,त्रिशंकु  सा आज भी वही खड़ा हूं,

जहाँ योजनो पूर्व स्थित था,

मेरे लिये काल में कुछ नहीं बदला, मेरे लिए कल ने कुछ नहीं बदला,

क्योंकी शायद,

मैं ही हूं अश्वथामा।

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© Abhishek Yadav 2016

 

 

मैं चला मैं चला

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मैं चला , मैं चला

कभी इधर कभी उधर , न जाने किधर किधर ,

हुँ मैं मनमौजी , करता नहीं किसी की फिकर ,

मैं दुनिया से बेखबर, बस रहता इधर उधर ,

मैं चला, मैं चला |

न जाने क्यों है जाना , क्यों मैं हुँ मनमाना,

न किसी से पूछना , न किसी की बताना ,

बस गाना अपनी धुन अपना तराना ,

मैं चला मैं चला  |

सच कहुँ होती है मुझे भी फिकर ;लगता है डर,

अनदेखे का डर , कुछ न होने का डर, कुछ न कर पाने का डर ,

कुछ न दे पाने का डर ,

इन डरो से रहता हुँ घिरा, हर वक़्त मै, हर फिकरा,

जो भी करो , तो भी कुछ न कुछ कहेगा  जमाना ,

दुनियावाले ,अपने सारे,दोस्त यार , सब कभी कर देंगे बेईमाना,

मैं चला मैं चला  |

न रहेगा आखरी वक़्त में मेरे सिवा, कोई सुनने वाला,

न कोई होगा सुनाने वाला , अपने दिल का तराना,

तभी तो मैं चला ,

और , मैं ही चला   alone-man-in-city-wallpapers-box

 

बड़ी जद्दोजहद  के बाद , अपनी पुस्तैनी ज़मीं पर पैर रखे ,

कुछ झीज़कते , कुछ हिचकिचाते ,

उन उजड़े , बिखरे , बेतरतीब , छप्परों के नीचे,

अपने कदमो को जमाया |

सीलन भरी दीवारे और उसकी फीकी पड़ी पुताई ,

जो कभी , किलकारी भरती थी ,

वो रंगीन चबूतरे , लहलाती छज्जे ,

जो कभी सीधी खड़ी रहती थी |

न जाने क्यों आज वह पर

सड़न कुछ गलने की घुटी घुटी सी हवा भरी है ,

जो आँगन कभी चहल कदमी से भरा रहा करते थे ,

जिनकी शामें गुलजार रहा करती थी ,

जिनके दरवाजों पर , मेरे बुजुर्गो का कहकहा  हुआ करती थी |

उन दरवाजों  पर मरघट का सन्नाटा है ,

दम घोटू  माहौल सा बना बैठा है ,

मेरी यादें, इस घर से जुडी थी ,

मेरी लोरी की यादें , कहानियों की उड़ाने ,

मिटटी वाले चूल्हे की गर्मी ,भूसे की नरमी ,

ओष की ठंडी बूँद , और वो कुहरे भरी राते ,

और न जाने कौन कौन सी सब की सब ,

कच्ची मेढ़ो की तरह पग-पग बदल कर ,

मेरे संस्मरणों में घुमरने लगी |

जब तक कुछ बूंदे  मेरी आँखो से लुढक पड़ती ,

मानसून की बारिश बनकर ,

मैंने बंद कर दिए पुराने किवाड़ ,

अपने पुरानी यादो के ,

फिर चिराग बुझा कर , चल दिया ,

अपने जगमगाते , चमकीले , पथरीले  शहर की तरफ ,

जहाँ  मेरी जरूरतें, मेरा इंतज़ार कर रही थी |

औऱ मैं मुड़ भी गया, औऱ भाग पड़ा ,

न जाने क्यों पीठ दिखा कर |

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आज की रात

 

आज रात जब चांदनी अपनी रौशनी फैलाएगी,

जब तारो की लड़िया बलखाएगी,

जब हवा बहार बन जाएगी,

जब रात की रौशनी और स्याह हो जाएगी,

जब आकाश की टिम-टिम  अपना  गीत गुनगुनायेगी,

जब महक, अँधेरे की वक़्त पर फैल जाएगी |

जब तुम अपने सिरहाने मखमल की पंखुड़िया लगाओगी,

जब तुम बर्फ सी  ठंडी चादरें बिछाओगी,

जब तुम सपनो की चासनी में आओगी  ,

जब तुम  अपने आप को  वक्त के आगोश में देने, जाओगी |

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बस उसी वक्त , अपनी खिड़कियाँ खुली रखना , आज की रात ,

 मैं  आऊंगा , होकर अँधेरे के अश्व पर सवार ,

महसूस करने  वक्त की सुंदरता ,

तुम्हारी  चाँद से सादगी ,

तारो सा ठंडापन ,

महसूस करने वो रेशमी  साँसे,

देखने कंचन आभा ,

सुनने प्राण-वायु का संगीत ,

छु लेने अनुपम आभा |

बस मैं आऊंगा जब तुम सपनो में होगी ,

और मैं वापस चला जाऊंगा ,

जब तुम मेरे सपने में होगी,

पर मैं आऊंगा , आज की रात |

© Abhishek Yadav 2015

पुरुष

शायद  तुमको लगता मै निशब्द , भावहीन , संवेदनहीन ,तर्कविहीन, हाड-मांस  काया , काठ का पुतला,

कुछ उजला, कुछ धुंधला,

संवेदनाये मुझ में भी है ,अभिव्यक्ति मुझे भी आती,

आँखों से खारापन मेरे भी बहता ,जिव्या मेरी भी कुलबुलाती  |

जीवन मेरा , सीमाये मेरी ,मेरी अभिलाषाएं ,मेरी महत्वाकांक्षये ,

सब की सब , एक दायरे में, एक सीमा में रहती ,शायद ही कभी अपनी मर्यादाओ से आगे बहती  |

इच्छाएं कर्मो के आगे रुक जाती,

भावनाएं दायरे में रह जाती,

स्वप्न जिम्मेदारियों में फस जाते,

महत्वाकांक्षये सम्मान से रह जाती  |

मै अपने बनाये संविधान से ही हारा,

लगता है बन गया बेचारा,

चाह कर मै अपने आप से बहार न आ सकता,

मै बहुत कुछ नहीं कर सकता,

क्यों की मै पुरुष हूँ   |
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वर्षो के संघर्ष  के बाद , आत्मा के अथक प्रयासों के बाद ,

परिस्थितयो के भयावह झंजरवातो को सहने के बाद ,

रक्तरंजित  सम्बन्धो की छति के बाद,

अर्वाचीन नविन अनुभवों के बाद ,

आत्मतृष्णा, आत्मतुष्टि के बाद ,

व्यक्तित्व के टूटने के बाद,

जीवन-आधार खिसकने के बाद,

उत्थान पतन के संघर्सो के बाद ,

माया मोह के ज्ञान के बाद  |

अथक पुरुषार्थो और अकथ्य कर्मो के बाद भी ,

शून्य मिला,

विस्तार-हीन,आयाम विहीन ,ब्रम्हांड दर्शन  के बाद,

स्तब्ध्द खड़ा ,

जो कर्म , बोध ,ज्ञान, जय, विज्ञानं, दर्शन , सब अर्जित कर,

आज लूटा  मिटा ,

शौर्य,यश ,कीर्ति ,साहस,प्रेरणा , अनुशासन , के बाद भी,

दिशाहीन  पड़ा,

इन सबके  बाद भी वहीँ आ खड़ा , जहाँ से की थी , जीवन की शुरुवात  |

पर इन कोलाहल , उठा पटक ,जय पराजय ,के बाद भी ,

मेरा कर्मयोग ,मेरा हठ्योग ,मेरा पुरुषार्थ ,है मेरे साथ खड़ा ,

चलो आज से ,अभी से ,नए जीवन युद्ध की दुदुंभी, बजाऊंगा ,

नव प्रयासों ,नव योग ,से जीवन का चक्र चलूँगा  |

अब की करनी है लड़ाई परिस्थितयो आर पार,

अगर परास्त भी हो गया , तो भी हार मन के न बैठ जाऊंगा ,

अगली बार फिर से जीवन-युद्ध के नक्कारे बजाऊंगा  |

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© Abhishek Yadav 2015

 

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सत्य  का बोध , जीवन का अभिशाप है ,

सत्य आप को उषा -निशा ,

जय – पराजय ,

स्वत्रन्त्र -पारितंत्र ,

ऊंच- नीच ,

पाप- पुण्य

और  जीवन – मृत्य का बोध करता है  |

 

हम जीते है इन्ही शब्दों के जंगल में,

मंगल – अमंगल,

अच्छे – बुरे ,

सत्य – असत्य,

सत- तम,के बीच ,

पर ये सत्य ले जाता है ,

पार ,

दूर बहुत दूर ,

 जहाँ कही भी , कुछ भी भेद भाव नहीं है  |

 

सत्य बताता है , दिन और रात एक है ,

पुण्य बिन पाप के जीवित नहीं रहता ,

राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनने के लिए रावण चाहिए ,

वासना आध्यात्म का एक रूप है,

ज्ञान से अज्ञान बढ़ता है, घटता नहीं

ये सिर्फ सत्य बताता है, और सिर्फ सत्य ही बताता है  |

 

सत्य सिर्फ दर्द देता है, केवल दर्द,

आपके मूल्यों , सिधान्तो , आप की निष्ठा को चोटिल करता है ,

आप को ज्ञानी नहीं वरण अज्ञान आसक्त करता है,

आप को नीलकंठ  बनाता है  |

 

ज्ञान की पीड़ा , सत्य की पीड़ा  शिव को ज्ञात है ,

शिव ज्ञानी है , शिव पीड़ा जानते है ,

और साथ ही , शिव  सत्य की सुंदरता को भी जानते है, मानते है ,

तभी तो सत्यम शिवम  सुंदरम  है ,

शिव को नमन है , उनकी  शांति , उनके धैर्य को नमन है ,

और उनके सत्य साध्य को नमन है ,

हर हर महादेव  ||

 

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मेरे वतन

इस आज़ादी की कीमत चुकाऊ कैसे,

जो दिया तुमने ये आबाई वतन बताऊ कैसे ,

मौका दिया ज़िन्दगी बनाने का ,

हुनर दिया , किस्मत सँवारने का

दी तालीम , जानने को कैसा होता है ये जहान.?

मौका दिया, खुद दुनिया देखपाने का,

ये वतन तुमने बहुत दिया  |

जो न मिल सका उसका कोई गम नहीं ,

नहीं रोना की क्या मिल सकता था ,

न मुशवर्ती करना की मैं किस काबिल था,

हुनर मेरे हाथो में दे दिया ,

जस्बा दिल में मेरे दे दिया  |

न रोऊगा, औरो की तरह मुकमल जहान के लिए ,

हो सकेगा तो करूँगा अपने अधूरे सपने पुरे तुम्हारी छाँव तले,

जो खुद  न मिल सका , उसको बनाऊगा ,किसी और को बेदार बनाऊगा ,

ये वतन जो दिया तुमने बहुत दिया है,

अब मेरा  भी हक़ बनता है तुम्हे कुछ देने का,

मुझे अपने आगोश में लो लो मेरे वतन ,

और ज़ी लेने दो मुझे मेरी ज़िन्दगी अपने छाँव तले  |

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सपने सिर्फ सपने नहीं होते ,

सपने सिर्फ सपनो के लिए नहीं होते,

सपनो से पहचान होती है,

सपने ही जीवन का ज्ञान होती है |

 

 

सपने देखना , सपने दिखलाना ,

और; सपनो को पूरा करने का अभिमान सिखलाना ,

अपने सपनो के लिए मर मिटना ,

सपनो के लिए ही ज़िंदा हो जाना |

 

 

सपनो से ही सपने बुनना ,

अपने सपनो से ही, दुसरो को सपने दिखलाना ,

और अंत में सपने दे कर,

खुद सपना बन जाना  |

 

 

तुमने मुझे है , ये सब सिखलाया ,

तुमने मुझे , ये सब बतलाया ,

तुमने मुझे ,करना, मरना,मिटना, और फिर जी जाना बतलाया |

 

 

अलविदा , मुझे सपने दिखलाने वाले ,

अलविदा , मुझे सपनो में जीना सिखलाने वाले ,

अलविदा,  सपना बन जाने वाले,

अलविदा कलाम,

कलाम तुझे सलाम !!

 

 

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बारिश

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पानी की नन्ही बूंदे भी क्या कमाल करती है ,

जो न चाहो वो भी कर दे, वो हाल करती है ,

कभी याद दिलाती है कागज की नाव ,

कभी याद दिलाती है लेना पीपल की छाव,

कभी घुटनो तक छप-छप कर जाना ,

कभी अपने जूतो को थैले में लेकर आना,

कभी गिर जाना साइकिल से नाली पे,

कभी पत्थर फेकना कच्ची आम की डाली पे ,

कभी भीगना जब तक दिल न करे,

कभी पकोड़े खाना जब तक पेट न भरे ,

पर न जाने क्यों अब बारिश में वो बात नज़र नहीं आती,

कीचड़  से डरना, वक्त पर पहुचना,भीगने से बचना,

सर्दी की दवा खाना, आकाश देख कर गम से भर जाना,

या काम पर देर के डर से मर जाना ,

न जाने अब बादलो के आ जाने से डर का एहसास होता है ,

या बारिश बदली है या फिर मैं बदला हुँ |

बारिश तुम से अपने दिल की बात कहता हुँ,

अबकी तुम गरज बरस कर आओ,

मेरे दिल की गर्द हटा ले जाओ,

मेरी आत्मा की मैल बहा ले जाओ,

आओ मेरे जीवन में बन कर उम्मीदों की बाढ़ ,

अबकी मैं बैठा हुँ बह जाने के लिए तैयार ,

तुम्हारे आने पर मैं मुस्कुराउगा,

परिवर्तन के गीत गाऊंगा,

आओ बारिश तुम झूम कर आओ,

अपने संग मुझको भी बहा ले जाओ,

आओ बारिश , अब आ भी जाओ |

 

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दिवास्वप्न

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एक सुनहरे स्वप्न से थी तुम , मेरी नीदो में आई ,

सोयी आँखों से सांसो तले,

बढ़ती हुई , सपनो में दबे,

हृदय में पिघलती  हुई,

नसों में भर्ती गयी |

 

एक सरसराहट , एक सुगबुगाहट , एक सरसरी सी बदन में थी आई,

और उम्मीदों में बस चली ,

एक कम्पंन चेतना में ,

एक  कुलबुलाहट उम्मीदों में,

एक वेग विचारो में ,

एक उत्तेजना सांसो में बह चली,

लग गया की आकांछाओ की हुई इतिश्री |

 

तभी आधार हिला और मै सत्य के रसातल पर आ गिरा,

और फिर मुस्कुराया ,

अरे  तो कुछ भी नहीं बस स्वप्न था,

कुछ भी नहीं कुंठित विचारो का अदृश्य प्रदर्शन था,

तुम कुछ नहीं बस एक वैचारिक उत्तेजना थी,

जिसने मेरी भावनाओ के खोखलेपन को उजागर कर दिया ,

हाए.. तुम कुछ भी नहीं एक दिवास्वप्न ही थी |

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मेरा कर्म

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मै चला था साथ तुम्हारे , तो लगा था ,

जिंदगी आसान बन जायेगी, जो भूली बिसरी कुछ  यादें थी,

बस यादें बन कर रह जाएगी,

तुम्हारे संग हो जाऊंगा मै भी जीवन धारा के उस पार,

शायद जीवन संघर्ष के बाद , मैं भी कर लूँगा पयार |

पर मैं था भूला , स्वमभू-योद्धा मार्ग से बहका , तुम को देख कर था चहका ,

मैं तो जीवन संघर्ष करता , निरन्तर युधोन्नत, सतत पथगामी ,

मैं लड़ाका, अभिशापित जीवन रैनबसेरा ,  पर नहीं विदित बसेरा ,

मैं स्वयं, मार्ग को भूला, अपने दाइत्वों से था झूला |

अब जागा हुँ इन्द्रिय निद्रा से ,अब उठ खड़ा हुआ हुँ घनघोर हृदय पीड़ा से ,

अब चलुंगा यात्रा पर, अपनी जीवन यात्रा पर |

हे प्रेम , मुझे कमजोर, रणछोड़क मत कहना ,

ह्रदय विदारक , भाव विनाशक  मत समझना ,

मैं तो योद्धा हुँ ,

जीवन में चलते रहना ही,

मेरा कर्म है |

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तुम्हारी किताबे

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किताबे मुझे कुछ बताती है, तुम्हारी किताबे बहुत कुछ बताती है ,

तुम्हारा किताबो में उलझ जाना , फिर लेटे लेटे अपनी लटो को सहलाना ,

तुम्हारा मध्यम मुस्कुराना ,अपने गेसुओं को उलझना,

कभी सुर्खाब के पर लेकर उड़ जाना ,

कभी चाँद को जमी पर , कभी मछलियाँ आकाश में तैराना,

कभी करना अपनी आँखों को पूरी रात सुर्ख लाल ,

कभी उलझना , सहलाना ,कभी हटाना , कभी फैलाना अपने बाल ,

कभी तर करना कागज़ को देकर अपनी उंगलियो का पसीना ,

कभी पन्ने मोड़ देना  सोते वक़्त देकर अपना सीना |

ये सब मुझे तुम्हारी किताबे बतलाती है ,

और क्या कुछ नहीं तुम्हारी चुगलीया सुनाती है,

कैसे तुम मरोड़ती हो, ज़िल्दो को अपनी आगोश में,

कैसे रंग देती हो , किताबो को जोश में,

कैसे तुम उड़ जाती हो , शब्दों के पार ,

कैसे तुम कर लेती हो, कहानियो से पयार ,

कब तुम्हारा दिल टुटा , कब तुम मुस्कुराई ,

कब तुम्हारा गला रुन्घा, कब तुम खिलखिलाई ,

किताबे तुम्हारी बहुत कुछ बताती है , बहुत कुछ समझती है |

काश मै भी तुम्हारी किताब होता , तो हर वक़्त तुम्हारे साथ होता,

तुम मुझ संग हँसती,मुस्कुराती , हाथो में लेकर बलखाती,

कभी होता तुम्हारे हाथो में करता संग सपनो की सवारी ,

घूमता कल्पना की दुनिया में , लेकर तुम्हारी यारी |

तुम्हे है किताबो से पयार , मुझसे इंकार ,

अब कुछ नहीं बस सादे कागज़ रंगते जाऊंगा ,

शब्दों की फसल लगाउँगा ,

और सब एक साथ कर मोटी किताब बनाऊंगा ,

तब शायद , तुम्हारे करीब आ पाउँगा , शायद तुम्हारे दिल में बस जाऊंगा ,

और तुम्हारे दिल में अपने शब्दों से बस पाउँगा ,

शायद, तुम्हारी सबसे हसीन किताब बन जाऊंगा |

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मैं आऊंगा

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खुद को तुम अकेला क्यों समझती

मै तो हूँ, हर जगह तुम्हारे साथ |

तुम्हारे सुबह की लाली में,

तुम्हारी सुर्ख रात की स्याह काली में |

बहता हूँ मै तुम्हारी सांसो के साथ ,

मैं ही तो करता हूँ तुम्हारी बातो से बात |

तुम्हारी मुस्कराहट के साथ मैं भी खिलता हूँ ,

और तुम्हारे आँसुओ के नमक से भी मिलता हूँ |

चलता हूँ तुम्हारे साथ बनकर बादलों का ढ़ेर,

चाँद बन कर देखता हूँ , जब तुम आती हो रात को देर |

तुम्हारे तकिये पे  बैठ, अपनी गोद ने, मैं तुम को सुलाता हूँ ,

जब थक जाती हो तो, सपनों में आकर  लोरी सुनाता हूँ |

 

मैं था , मैं हूँ , तुम्हारे लिए  बस अब न खुद को बेक़रार करो,

बस आ रहा हूँ तुम से मिलने , कुछ और इंतज़ार करो |

हम मिल जायेगे  और मिल कर  एक शून्य बनायेगे ,

तुम मुझसी हो जाना , मैं तुम सा हो जाऊंगा , और हम समपूरक  हो जायेगे |

तब तक करो इंतज़ार , विस्वास रखो मैं आऊंगा ,

मैं आऊंगा |

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मेरी ज़िन्दगी हो  

मेरी ज़िन्दगी हो....
मेरी ज़िन्दगी हो….

जब जब तुम्हारे गेसुओं में आता हुँ,

हर बार तुम को ज़िन्दगी कुछ नया नया सा पता हुँ ,

तुम्हारी स्याह आँखों से जितना नज़रे मिलता हुँ ,

हर बार तुम्हारी साँवले जाल में फसता जाता हुँ ,

तुम्हारी बातो को जितना सुनता जाता हुँ,

हर बार खुद को उलझा पाता हुँ ,

ज़िन्दगी मैं क्या बताऊ , मैं तुम को कितना चाहता हुँ  |

 

 तुम होगी अलग मेरी कविता, कल्पना , कथन, कामना , कर्म के पार ,

या शायद तुम होगी अबूझ , अगम, अदभुद, अकल्पित ,मेरी आकांछाओ  से करती  तकरार ,

नहीं तो होगी नीरस ,निर्जीव , नीड़, नमित, करती  नज़रो से  तकरार ,

तुम कैसी भी हो , चाहे जैसे भी हो , मुझे है तुम से है प्यार ,

आखिर हो भी क्यों न , तुम मेरी ही तो हो ज़िन्दगी ,

तुम मेरी ज़िन्दगी हो  ||

                              

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मैं  तो ज़िन्दा हुँ

मैं तो ज़िन्दा हुँ
मैं तो ज़िन्दा हुँ

तुम मुझसे प्यार  नहीं करती , दुःख नहीं ,

तुम को मुझसे इकरार नहीं , कोई गम नहीं ,

तुम को मेरे होने या न होने से फर्क नहीं, अच्छा है ,

मै तुम्हारा हम-साया नहीं बन सकता , मुझे उफ़ नहीं

मै तुम्हारा हम-कदम नहीं, कोई दर्द नहीं ,

कोई बात नहीं की मैं तुम सा नहीं ,

और चाह कर भी तुम जैसा नहीं बन सकता , कोई मसला नहीं ,

मुझे कोई गम नहीं , तुम मेरे साथ नहीं या तुम मेरी नहीं |

 

 

मुझे तो खुशी है,

मुझे तो खुशी है की मैं फिर से महसूस कर सका ,

मेरे मरे हुए जस्बात ,

सूखी आत्मा  में तरंगे ,

बुझे दिल में हिलोरे ,

बासी आखो में तुम्हारे ख्वाब ,

कोई बात नहीं ,सच में कोई बात नहीं ,

मुझे तो ख़ुशी है ,की मैं ज़िंदा हुँ,

और मेरे अरमान न खत्म हुए ,

तुम मेरी ज़िन्दगी न बन सकी , पर तुम ने  मेरे ज़िन्दा होने के एहसास को ज़िन्दा कर दिया ,

ओह ! मैं  ज़िन्दा हुँ ,  ज़िन्दगी ,

मैं  तो ज़िन्दा हुँ ||

 

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  मेरी माँ अलग थी

मेरी माँ अलग थी....
मेरी माँ अलग थी….

मेरी माँ अलग थी, मुझे कुछ और ही बातें बतलाती थी,

की न कोई राजा, न रानी ,न शैतान, न परियो के किस्से सुनती थी,

ज़िन्दगी आसान नहीं है ,रास्ते खुद नहीं बनते ,

मंजिले तराशनी है , आँसुओ की कीमत नहीं,

सच की कोई हार नहीं , और न जाने क्या क्या सुनती थी  |

 

मेरी माँ बड़ी अजीब थी , अजीब अजीब सी चीज़े सिखलाती  थी,

मुझसे काम कराती , खुद काम करना सिखलाती ,गलतियों पर डांट देना,

शिकायत आने पर मार देना, अलग अलग किस्से बुनती और हम लोगो को बतलाती थी  |

 

लगता था क्या माये, ऐसी होती है .? क्या ऐसी चीजे बतलाती है ..?

आँख खोल सोना, न किसी के सामने रोना ,

मुस्कुरा कर अपनी रोटी खाना ,दुसरो की दाल देख न ललचाना,

अपनों के लिए झुक जाना , सम्मान के लिए लड़ जाना ,

इज़्ज़त के लिए मार जाना , बुरे समय से न घबराना ,

और न जाने क्या उल्टा सीधा सिखलाती थी ,

शायद मेरी माँ कठोर ,निष्ठुर ,बाबली थी,की ये सब बतलाती थी  |

 

समय बिता ,साल बीते , और अपने ,और अपनों के हाल बीते ,

ज़िन्दगी में न राजा , न रानी देखि ,न कोई बुढ़िया सायानी देखी

देखी दुनिया देखी और दुनिया की चाल ,

अपनों के बीच न अपना देखा , न मिला बिन काम पूछने वाला हाल  |

 

ज़िन्दगी थी वैसी जैसी मेरी माँ मुझे बतलाती थी ,

हाँ भाई दुनिया तो वैसी निकली जैसी मेरी अबूझ माँ मुझे समझती थी,

शायद उसे शौक नहीं था , ख्वाब दिखाने का,और ख्वाबो के तोड़े जाने का ,

इसीलिए कड़वे सच बतलाती थी ,

मेरे कोमल बचपन को, अपने अनुभव ,इरादो, और इल्म से पकती थी  |

 

वो पागल नहीं, सनकी नहीं , अजीब भी नहीं थी ,

वो बनी मेरे जीवन का कुम्हार , मेरी सोच का आधार ,

मेरे विचारो का आकार, मेरे वक्तित्व का चमत्कार ,

मेरी माँ अलग थी, अलग बना गयी मुझे ,और करा गयी आत्मसार ,

अब क्या बचा करने को सिवाए नमस्कार  |

 

 

मै फिर भी कर रहा हु इंतज़ार , तुम फिर से आओ ,

और फिर से गोद में लेकर ,सीने से लगाओ,

और अगले जन्म ,और उसके भी अगले जन्म अपना पुत्र बनाओ ,

और हर बार मुझे दुनिया से अलग और अलग बनाओ,

माँ तुम सच में अलग हो  ||

 

  मेरी ज़िन्दगी

मेरी ज़िन्दगी...
मेरी ज़िन्दगी…

अच्छा लगा तुम से मिल कर ज़िन्दगी |

काफी दिनों बाद कोई अपना मिला ,

कोई नहीं बचा मेरा , ये सोच,सोच कर जिए जा रहे थे,

और गमो को जिगर में सीये जा रहे थे |

अपनी राह पर खुद को लिए जा रहे थे ,

और पैबन्द भरी खुशियो को , जमा किये जा रहे थे |

पर तुम को देख कर आंसू खिल गए ,

आत्मा और दिल मिल गए |

तुम दिव्य हो, दिव्यात्मा , या फिर मेरी आत्मा |

पता नहीं तुम कौन हो , कहाँ से आई , कहाँ को जाओगी,

पर पता है ,

जब तक रहोगी खुद हसोगी और मुझे खिलखिलाओगी|

तुम कहाँ थी ज़िन्दगी …?

अब कही मत जाना , हो सके तो रुक जाओ ,

मेरी बस्ती को कुछ वक़्त ही सही अपनाओ |

फिर चली भी जाओगी तो कोई गम नहीं ,

ये एहसास तो होगा और याद भी होगा ,

की, कभी मैने भी जीयी थी ज़िन्दगी |

आबाद हो जाओ

आबाद हो जाओ....

अच्छा किया जो तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया,बीच राह , बिन बात तोड़ दिया |

और छोड़ दिया मुझे मेरे फटे हाल, और चले गए अपनी मज़िल की चाल |

अच्छा किया , जो तुम ने ऐसा किया |

ऐसा न करती , क्या मै जानता की ज़िन्दगी क्या होती है ?

जब लोग अपनी राह चाल जाते है, आप पीछे छूट जाते है ,

कोई नहीं होता काफिले में, बस आप रह जाते है |

सारे अपने,आगे या पीछे रह जाते है |

छोड़ जाते है आप को अपने हाल , जियो या मरो,

आप का साया आप से रूठ जाता है,

अपने कंकाल में आप फ़स कर रह जाते है |

अपनी धङकनो को आप ही सुन पाते है ,

और फिर आप ,आप और आप ही रह जाते है |

अगर तुम मेरे साथ होती तो, मै ये इल्म न जान पाता,

और अपनी ज़िन्दगी फर्श पर कैसे ला पाता |

आज अपनी बेबसी पर कुछ इस तरह न फूला समाता |

जाओ , अब आबाद हो जाओ , किसी और की ज़िन्दगी को बर्बाद कर के आओ, किसी और को मुझ जैसा बनाओ |

शायद वे भी , मेरी तरह ज़िन्दगी जीना सिख जायेगा , और तुम्हारी बर्बादी के गीत गुनगुनायेगा |

जाओ ज़िन्दगी फिर से आबाद हो जाओ |

मयख़ाना

न मिले कभी मेरे गमो को सहलाने वाले ,

मिले बहुत से मुफ्त पिलाने वाले |

मिला न कोई संग कब्र पर ले जाने वाले,

मिले बहुत से मैखाने में उठाने वाले |

दीवारे फट गयी मेरी सोख कर मेरी गूंगी चीखे ,

पर यार बहुत मिले, मयख़ाने में सुनने और सुनाने वाले |

कम अक़ल लोग क्यों शराब को कोसते है ,

क्यों  पीता मै, अगर मिल जाते मुझे ये समझाने वाले |

इस दुनिया से तो मयखाने अच्छे है ,

जहा मिलते है, मुझसे बदत्तर और दिलो को बहलाने वाले |

बिन मुखौटो के यही लोग मिल जाते है ,और यही मिल जाते है ,

मेरी सुनने और आप सुनाने वाले |

जब भी दिल बेबस हो, दिल नाराज़ हो, मयख़ाने जाना ,

मिल जायेगे यही तुम से ज्यादा, बदकिस्मत , बेबस और गमो के परवाने वाले |

आओ कभी बैठे  हम, तुम और मेरे मयख़ाने वाले,

ताज़ा दम, बेफिकर हो जाओगे, तुम यहाँ से जाने वाले |

कहाँ हुँ मैं

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कुछ  पैसे मैं कमाता था , खुद अपनी रोटी बनाता था |

कुछ खास नहीं था मेरे पास , पर रोज नींद आती थी |

चांदनी खुद  मुझे रोज  सुलाती थी , तारो की बारात मेरे खाट पर आती थी |

रोज खुद के लिए वक़्त निकल पाता था , और जो अपने थे उनको अपनी बात बतलाता था |

अपनी ज़िंदगी, अपने हाल पर जीये जाता था |

एक रोज आया उम्मीदों का साया.. बतलाया ,

“ये क्या ज़ी रहे हो..? आगे की ज़िन्दगी में क्या ज़ी पाओगे…?

ऐसा ही रहा तो वक़्त पर क्या निशान छोड़ पाओगे..?

यु ही ज़िन्दगी एक दिन ख़त्म कर जाओगे .. न कुछ छोड़ोगे,कुछ भी सितारे न बचाओगे ..?”

ज़िन्दगी में काले साये भी आते है, दिन में ग्रहण भी लग जाते है |

क्या करोगे जब थक जाओगे, कहाँ भागोगे , कहाँ  जाओगे |

मैं ठिठका , घबराया , सोचा, “मस्त मौला ज़िन्दगी से कुछ न हो पायेगा

कैसे मेरा नाम इतिहास में अंकित हो पायेगा..?

निर्णय किया कालजयी बनुँगा, चहुदिश विजय अभियान होगा ,

हर ओर मेरा और मेरा ही नाम होगा |”

तब से लिया मैंने उम्मीदों का साथ, महत्त्वकांछाओ को ले कर हाथ, विजयी बनने चला |

मिल गयी बहुत से मंज़िले , बहुत से कीर्तिमान , बहुत से सितारे , बहुत से अपने, बहुत से प्यारे |

पर आज नींद नहीं आती है , हर रात,  एक नए सपनो का आगाज़ लाती है |

मलमल के  बिस्तर पर, करवटे बदले बदले राते चली जाती है |

अँधेरी रातो में धुंधले सायों की बरसात नज़र आती है, आँखे मुंदने पर बेचैनी छा जाती है |

कानो में स्वर्ण ध्वनि आती है,बादल पर  अग्निवर्षा छा जाती है |

और रोज रोज आत्मा कहती है ..

.

.

“कहाँ हुँ मैं” |

आत्म मंथन

सोचता ही रह गया सारी ज़िन्दगी की मेरे भी दिन आयेगे , जब आयेगे तो लोग देखते रह जायेगे |

न होगा कोई ओऱ छोर, होगे जगमग बादल चारो ओऱ |

दीये उम्मीदों को टीम टिमटिमाये गे, मुस्कान के फूल लहलहाए गे |

जो ख्वाब देखा था सब पूरे हो जायेगे |

पीछे देखता हुँ, तो बस पता हुँ अधूरे ख्वाब, टूटी उम्मीदे  और सिसकते आप |

चाह कर भी न पाया खुशियो की डोर ,पर फसा पाया  खुद को हर ओऱ |

पैबंद लगी उम्मीदों से क्या ज़िन्दगी गुजार पाउँगा ,सोचता हुँ की शायद कर ही न पाउँगा |

कोई साथ नहीं अब मेरे, सब चले गए अपनी – अपनी ओऱ , मै मझ धार  जहाँ से न कोई ओऱ छोर |

क्या करू ..? क्या विलाप करू ..?, या करू ब्रह्म हत्या,

कैसे खुद को मुक्त कराउ, कैसे उम्मीदों  की चुभन से खुद को बचाऊ |

शायद  यही है अंत मेरा और ऐसे ही मै विश्व को अपनी कथा सुनाऊ |

तभी आत्मा बोली ” मुर्ख क्यों बिखरते जाते हो ..? क्यों  प्रारम्भ में ही अंत को बुलाते हो,

क्या हुआ जो तुम्हारे स्वप्नों की हुई आहुति , क्या हुआ जो तेरी अभिलाषाओ की न हुई इतिश्री,

क्यों घबराते हो , न कुछ खोया, न कुछ पाया , तो फिर क्यों विलाप करते जाते हो |

उठो और नव दिवस में,नया विकासः  करो , नए  दिन से ने स्वप्न का आभाष करो |

टूटे दिल में धार नहीं होती, और लड़ने वालो की हर नहीं होती |

जाओ , जो न मिला उसे भूल जाओ , जो मिल सकता है उसे ले कर आओ |

हार गए तो भी योद्धा कहलाओगे , गर जीत गए तो जो चाहा था पा जाओगे |

तब अब मुस्कुराओ और फिर लड़ने जाओ |”

 

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जीवन

  • सीधी रेखा मे चलना चाहता हू जीवन मे, पर जीवन तो है रेखाओ का जाल |

    जितना सुलझाने की कोशिश करता , उतना बिखरता ये मकाड़जाल |

    रोज नयी कहानी, रोज नयी परेशानी, जीवन साँसो की आधा- प-ती |

    रोज -रोज संघर्ष की कहानी, जो खतम ना हो पाती |

    समस्याए है अनंत, अकट्टये, अपरंमपार,

     पर  इन से निपत का की संघर्ष है, जीवन का सार |

    जो भी जीवित है, उसकी जीवन मे संघर्ष रोज नया, जिस दिन बिखरे उस दिन जीवन ही कहा…?

    जो भी मैने जीवन सी सीखा बतलता हूॅ, संघर्ष से मत डरो ये ही कह पता हूॅ |

    जो संघर्ष किया तो ही आगे बढ़ पाओगे , बिन संघर्ष रेंगते रह जाओगे |

    जो आगे ना बढ़े , उपर ना उठे , तो जीवन क्या …?

    क्या सीखोगे , क्या दूसरो को संघर्ष स्मरण बतलोगे ..?

    मृतक ही आराम से सोते है , आराम से रह पाते है, जो जीवित है वो ही संघषो से गाथाये बनाते है |

    उठ जाओ भरो फिर से नयी चाल , बताओ परिस्थितीयो को अपने लड़ने से जीवित होने का हाल |

  • ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
ज़िन्दगी.....
ज़िन्दगी…..

 

 

 

 

  • ज़िन्दगी

    जितना तुम्हे सवारने की कोशिश की,उतना ही तुम बिखर जाती हो,

    ये ज़िन्दगी मुझे ज़रा बताओ, क्यो रेत सी मेरे हाथो से तुम छूट जाती हो |

    रोज कोशिशे करता हु तुम्हे सिरहाने रख पाने की,

    पर न जाने क्या तुम्हारी नियत है, रोज उड़ जाने की |

    न चाहता हु तुम्हे काबू करना, ना ज़रूरत समझी कभी तुम्हे बरगलने की |

    हर रोज बनती हो, रोज बिगङती हो,

    हर रोज तुम्हे ज़रूरत है, नया फलक दिखलने की |

    हर रोज नया रंग, नया रूप देखा,

    वो भी देखा;जो कभी नही सोचा था तुमसे पाने की |

    फिर भी; फिर भी…ना कभी तुम से उबा, न ही थका,

    न ही कभी कोशिश की तुमसे दूर जाने की |

    कभी फ़ुर्सत मिले तुम्हे;

    आओ ज़िंदगी कभी मेरे पास, मेरे आगोश मे,

    कुछ बाते है तुमसे समझने और समझाने की |

    इंतेज़ार मे हू तुम्हारे,

    क्यो की फ़ितरत  है मेरी सवारने की और तुम्हारी बनाने की…|

 

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