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Random 

These are not my words, but really I find find them inspiring, yes it’s good sometimes to be average than a top notch. 

PERMISSION TO BE AVERAGE

It’s okay to be average! To do your best and know that it’s good enough. To fail. To try and fall flat on your face. To be imperfect. To be adequate, unspecial, and not the greatest.
In all cases, you are loveable, and miraculous as you are. Your human limitations and imperfections are beautiful and perfect in the eyes of the Universe. Take the pressure off yourself to be the biggest and the best, the most successful and the most loved, and bless yourself for being exactly what you are. 
Realise that this radical self-love has nothing to do with ‘giving up’ or ‘settling for less’; it’s actually the basis of a joyful, liberated and abundant life. 
Be average, 

and dance into the miracle. 
– Jeff Foster

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अनकही बाते…..

आज रात भर चाँद को देख कर रात गुजारी ,

न जाने क्यों , अजीब सा दिल था ?

रात तो काली थी पर बहार  बिखरा दूधिया उजाला था ,

हवाओ में सिहरन थी , और

ओश पिघली, सरकती सी बाह रही थी ,

कनपटी से ।

चारो ओर सनाटा था ,

 

बस जो धधक रही थी ,मेरे सीने में ,

एक बेबसी थी , अपने सपनो को पिघलता देख,

अपनी चाहते को, टूटी पत्तियों में दबता देख ,

और , जब न सह सका कड़कड़ाती ठण्ड ।

तो  अलाव जला ली, अपने सतरंगी वादों की ,

और  ऊंची ऊंची लपटों  में  अर्पित कर दी दमकती परछाइयाँ |

 

अब ,सुबह बस बची है ,बस चमकीली राख ,

सोचता हूँ ,की कहाँ ठिकाने लगाऊ अपनी,

 

इन अनकही बातो का  ?

© Abhishek Yadav 2017

Image source- Google

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सर्दी

नर्म घासो के गद्दे पर, चमकीली ओश की बतलाती थी ,
की रात, तुम हो  ।
टूटी हुई पत्तियों की चुरमुराहट  सुनाती थी ,
तुम्हारे होने का एहसास ।
बासी काली राख, हुआ करती  थी,
तुम्हारे बातो की गवाह ।
और बेतर-बीती से बिखरे प्याले, गरम होते थे ,
तुम्हारे बोसे से ।

 

आज भी  ओश की बारिश होती है ,
आज भी चाय के प्याले सजते है ,
आज भी अलाव की राख पसरती है ,
आज भी पछुआ बहती है ,
और आज भी तारो की बारात सजती है ।

 

पर न जाने क्यों दो लोग उदास होते  , आजकल ,
एक मै और दूसरा बूढ़ा चाँद ,
क्यों की हम दोनों को आज कल ,
आपस में  ही बाते करनी पड़ती है,
बाकि अब क्या कहु तुमसे ,

 

अब तो पहले जैसी ठंडक भी कहा पड़ती है ।

 

© Abhishek Yadav -2017

Image Source- www.google.co.in

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स्वतंत्रता दिवस, independence day 

स्वतंत्रता दिवस की आप सब लोगों को शुभकामनाएं  और नमन है, उन सब स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को जिन्होंने 1857 से लेकर 1947 अपनी आहुति देकर आने वाली पीढ़ियों के स्वतंत्रता की नींव रखी ,ताकि हम जैसी पीढ़ी स्वतंत्रता विचारों, स्वतंत्रता स्वपनों और स्वतंत्र प्रयासों से महान भारतवर्ष की स्थापना कर सके।

#वंदेमातरम।
Wishing Happy independence day to all of you and highly salute to all martyrs of independence struggle since 1857 to 1947 who became founding stones of our independence so that new generations like us could see free dreams, think free and make efforts to make India united and unstoppable. 

#Jai_Hind.

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ख्याल

हर बार अपनी बेबस मुहब्बत के जनाजे पर,
खुद को ये बोलकर समझाया ,
कोई और है,तेरी पाक मुहब्बत |

न जाने कब ,’पाक मुहब्बत’ के इंतज़ार में
मेरी पाक मुहब्बत , नापाक करार हो गयी ,
और बदनाम हो गए हम, तुम पे एतबार कर के मौला |

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ख्याल

वो इंतज़ार करते रहे बेकरारी से मेरी मिय्यत का,
हम बेबाक अपने मौत का इरादा ही बदल बैठे |
क्या मरना उस बेगैरत के लिए,
जो ज़िन्दगी की कीमत लगा बैठे |
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आ जाओ फिर तुम

कुछ  गहरी खाईया खोद रही है हम दोनों ने अपने दरमियान ,
जबकि फासला सिर्फ कुछ बोलो ,कुछ बून्द आँसुओ भर का है,
बेबसी तुमको भी है , बेक़रार मैं भी हूँ,
हया की दलदल में तुम भी हो,
जस्बातो के बवंडर में लड़खड़ाता  मैं भी हूँ |

 

न जाने कब हम बोलेगे , गांठ अपने दिलो की खोलेंगे ,
पहल का इंतज़ार मुझको भी है ,
और मुझ से बेक़रार तुम भी हो ,
कनखियों से ताकना मैंने भी देखा है,
नज़रे चुराके निहारना ,तुम ने भी पकड़ा है,

 

ये लुकाछिपी ,
ये अंतहीन पहले खेल,
मुझ से मैं को न हटा पाना , न जाने कहा तक
हम दोनों को ले जायेगा |

 

पर मैं , ज़िन्दगी भर तिलमिलाने , खुद ही खुद में बिलबिलाने ,
कब्र तक की बेबसी , खुद ही खुद में बुदबुदाने ,
वज़नों को सीने पर ढ़ोने से बेहतर ,
मैं कहता हूँ ,
आ जाओ फिर तुम , बस और नहीं  |

 

 

© Abhishek Yadav 2017

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I am in desert

Far from here, where I can’t reach.
In unknown location extreme from sight,
A site where no direction,
 A position without  dimension
I know you are there,

 

Because I live in desert
Far from emotions and feeling,
Dry and dusty place like my heart,
Soil without pulse and carving,

 

At this land, i suspect,
Moister, muggier, cold and breeze,
 Downpour, cascade, around and within me,
Same salty, same soaked, same savour.

 

Stop your droplets, stop moan,
I can’t bear breeze, that much feeling in my head,
Because now I live in the desert , My Love.

 

 

© Abhishek Yadav- 2017

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अक्शो का तिलिश्म

रो सकते तो क्या सुकून होता दिल को ,
इस तरह सरे आम , लिख कर ,
जस्बातो की नुमाईश न करनी पड़ती ,

 

बड़े किस्मत वाले है वो ,
रखते है दरिया-ए-अक्श,
यु पत्थर-दिल कहला कर,
रुसवाई हासिल न करनी पड़ती ,

 

गर पहले  समझ जाता इन अक्शो का तिलिश्म ,
तो  रुसवाई यार की सहनी न पड़ती ,
वक़्त पर कर लेता  कागज पर बंद , अपनी बेबसी का नाच ऐ,
मुहब्बत अपनी , रुसवा  न करनी  पड़ती  |

 

© Abhishek Yadav 2017
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