ख्याल

हर बार अपनी बेबस मुहब्बत के जनाजे पर,
खुद को ये बोलकर समझाया ,
कोई और है,तेरी पाक मुहब्बत |

न जाने कब ,’पाक मुहब्बत’ के इंतज़ार में
मेरी पाक मुहब्बत , नापाक करार हो गयी ,
और बदनाम हो गए हम, तुम पे एतबार कर के मौला |

ख्याल

वो इंतज़ार करते रहे बेकरारी से मेरी मिय्यत का,
हम बेबाक अपने मौत का इरादा ही बदल बैठे |
क्या मरना उस बेगैरत के लिए,
जो ज़िन्दगी की कीमत लगा बैठे |

आ जाओ फिर तुम

कुछ  गहरी खाईया खोद रही है हम दोनों ने अपने दरमियान ,
जबकि फासला सिर्फ कुछ बोलो ,कुछ बून्द आँसुओ भर का है,
बेबसी तुमको भी है , बेक़रार मैं भी हूँ,
हया की दलदल में तुम भी हो,
जस्बातो के बवंडर में लड़खड़ाता  मैं भी हूँ |

 

न जाने कब हम बोलेगे , गांठ अपने दिलो की खोलेंगे ,
पहल का इंतज़ार मुझको भी है ,
और मुझ से बेक़रार तुम भी हो ,
कनखियों से ताकना मैंने भी देखा है,
नज़रे चुराके निहारना ,तुम ने भी पकड़ा है,

 

ये लुकाछिपी ,
ये अंतहीन पहले खेल,
मुझ से मैं को न हटा पाना , न जाने कहा तक
हम दोनों को ले जायेगा |

 

पर मैं , ज़िन्दगी भर तिलमिलाने , खुद ही खुद में बिलबिलाने ,
कब्र तक की बेबसी , खुद ही खुद में बुदबुदाने ,
वज़नों को सीने पर ढ़ोने से बेहतर ,
मैं कहता हूँ ,
आ जाओ फिर तुम , बस और नहीं  |

 

 

© Abhishek Yadav 2017

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I am in desert

Far from here, where I can’t reach.
In unknown location extreme from sight,
A site where no direction,
 A position without  dimension
I know you are there,

 

Because I live in desert
Far from emotions and feeling,
Dry and dusty place like my heart,
Soil without pulse and carving,

 

At this land, i suspect,
Moister, muggier, cold and breeze,
 Downpour, cascade, around and within me,
Same salty, same soaked, same savour.

 

Stop your droplets, stop moan,
I can’t bear breeze, that much feeling in my head,
Because now I live in the desert , My Love.

 

 

© Abhishek Yadav- 2017

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अक्शो का तिलिश्म

रो सकते तो क्या सुकून होता दिल को ,
इस तरह सरे आम , लिख कर ,
जस्बातो की नुमाईश न करनी पड़ती ,

 

बड़े किस्मत वाले है वो ,
रखते है दरिया-ए-अक्श,
यु पत्थर-दिल कहला कर,
रुसवाई हासिल न करनी पड़ती ,

 

गर पहले  समझ जाता इन अक्शो का तिलिश्म ,
तो  रुसवाई यार की सहनी न पड़ती ,
वक़्त पर कर लेता  कागज पर बंद , अपनी बेबसी का नाच ऐ,
मुहब्बत अपनी , रुसवा  न करनी  पड़ती  |

 

© Abhishek Yadav 2017
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जुग़नू

खवाब भी मेरे थे ,मंजिल भी मेरी थी,
तुम आये तो ज़िन्दगी में रोशनी सी थी,
समझ न सका साथ जुग़नू का ,
जब रोशन मेरी मंजिल थी |

 

कदर न कर सका रौशनी का , जो साथ थी मेरे ,
हवश में था , चाँद के रौशनी में मैं तो ,
वो तो चाँद था , छुप गया , बादलों में तो,
ना तो चाँद मिला , ना मंजिल मेरी |

 

बेहया सा अब , जुग़नू की तलाश करता हूँ,
सीने में जस्प *कर लूंगा , आ मिल तो  मुझे |
जस्प*- अवशोषित  (absorve)

 

© Abhishek Yadav -2017
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खयाल

साथ चलने का ख्वाब दिखने वाले,

गम ये नहीं की ,साथ मेरे नहीं कोई,

बस सोचता ये ही हूं,

अब क्या करूँगा , अकेला मंज़िल पर पहुँच कर?

ख्याल

सपनों का पीछा करते करते पीछे बहुत कुछ छूट गया……

जीवन बदलने की कोशिश में जीवन ही कुछ छूट गया…..
जिसको गलत तस्वीर दिखाई उसको ही बस खुश रख पाया…..

जिसके सामने आईना रक्खा हर शख्स वो मुझसे रूठ गया………..