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हमारी ज़िन्दगी

जिंदगी गुजार दी आप धापी में जी कर,
कभी मेट्रो में लटक कर , कभी कन्धो पर लैपटॉप ढो कर,
नज़र फीकी पड़ गयी , ईमेल पढ़ कर,
जूते घिस गये केबिनो के सजदे कर ,
दुनिया बेच दी , स्लाइडें बना कर,
काले बालो से, बिन बालो वाले हो गये बन कर ,

शायद इस लिए , की इएमआई काट जाये,
शायद इस लिए , की कुछ खाते में बच जाये ,
शायद इस लिए , की अपनी डिग्री काम में आ जाये ,
शायद इस लिए, की माँ -बाप का नाम रह जाये ,

इस रेलम-पेल बस एक कसक बाकी रह गयी ,
अपने लिए कुछ न कर पाये,
एक लम्हा थमा से सुर्ख,चटकीला ;महसूस नहीं कर पाये ,
हाय! हम अपनी ज़िंदगी अपनी सी ;जी नहीं पाये।

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© Abhishek Yadav- 2021

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सोचा था ….

सोचा था , कुछ पैसे जोड़ पाएंगे ,
सोचा था , कुछ नया बनाएगे ,
सोचा था कुछ रिस्तेदारो मिलने जायगे
सोचा था , कुछ दोस्तों से गप्पे हाक पाएंगे ,
सोचा था , कुछ नया खायेगे,
सोचा था , कुछ नयी जगह जायगे ,
सोचा था , कुछ नये कपडे सिलवायेगे ,
सोचा था , कुछ अबकी नया सीख पाएंगे ,
सोचा था, कुछ अबकी तरक्की पाएंगे।

अभी सोच ही रहा था , की कलम जम सी गयी ,
ये तो साल २०२१ है;
सोच सोच में कब साल २०२० निकल गया ;
पलक भर एहसास भी नहीं हुआ ,
ये साल बीस, कुछ अजीब रहा ,
सिर्फ सोचते -सोचते में ही ,
हम सब की सोच निकल गयी, की


कितने बेबस , मजलूम रहे हम सब ,
कुछ न कर पाये हम सब, सिवाए सोचने के
..

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© Abhishek Yadav- 2021