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संदूक

आज भी सुबह के गुलाबी चमकीले बादलों के टुकड़ो को ,
टुकर टुकर देख कर याद आया ,
क्या अजीब सा शौक दे गयी तुम ,
हमारे ख्वाबो के रंगीन , कांच से चमकीले टुकड़ो को,
तुम्हारी गर्माहट में लपेट कर , यादो की संदूक में ,
तह लगा लगा कर रखना।

 

और बीच बीच में खोल कर देखना संदूको को ,
जब लगे खुद की अंदर कुछ कुछ ,
काला, सियाह अँधेरा ,
कमी गुलाबी चमकीली यादों की ।

आज भी तुम्हारी छोड़ी हुई यादो की संदूक रक्खी है,
तुम्हारी मर्ज़ी का भुरभुरा ताला लगा कर ,
अटारी पर दबा कर,

 

मेरी तो ,
हिम्मत ही नहीं पड़ती संदूक कभी खोलने की ,
खुलने पर न जाने कौन सा बदल तुम्हारी यादों का ,
बहार आ जाये , और लगे बरसने ,
मेरी आँखों के कोर से ।

 

बस इतनी गुजारिश है , कभी आ कर ,
इस संदूक को ठिकाने लगाती जाना ।

 

© Abhishek Yadav- 2018

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पनोती

कुछ तो बात होगी तुम में ,
हज़ारो शमा के बीच में रहकर भी ,
तुम्हारी रौशनी की यादें, आज भी चटकती है,
सुनहरी रेत आज भी , आँखों के कतरे से बहती है ,
पर चुभती नहीं है ।

 

 

खास तो है तुम में ,की मेरे यादो के भवर के ,
बीचो बीच में तुम हो ,
यु ही इश्क़बाज़ी, का समंदर आ कर तुम पर सूख गया |

 

 

ऐसी ही बाते , बहुत सी, बतलानी, समझनी थी तुम को,
पर तुम तो जानती हो ,
निगाहे मेरी ठहरी पनोती,
लग गयी मुझको ,
जिस रोज तुम्हे आँखो में बिठा के आईना देखा था ।

 

 

अब क्या कहुँ, जाते जाते ;
जरा अपनी यादों के कसक की दवा बताती जाना ,
बड़ी टीस मचती है अकेलेपन में ।

 

© Abhishek Yadav- 2018

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चाँद का टुकड़ा

कभी चाँद का टुकड़ा हुआ करती थी तुम ,
पर देखो तो आज ,
बस टुकड़ा ही टुकड़ा बचा है ।

 

चाँद तो मेरा , खो गया है,
अपने ही चकमक उजाले में ।

© Abhishek Yadav -2018

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