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अनकही बाते…..

आज रात भर चाँद को देख कर रात गुजारी ,

न जाने क्यों , अजीब सा दिल था ?

रात तो काली थी पर बहार  बिखरा दूधिया उजाला था ,

हवाओ में सिहरन थी , और

ओश पिघली, सरकती सी बाह रही थी ,

कनपटी से ।

चारो ओर सनाटा था ,

 

बस जो धधक रही थी ,मेरे सीने में ,

एक बेबसी थी , अपने सपनो को पिघलता देख,

अपनी चाहते को, टूटी पत्तियों में दबता देख ,

और , जब न सह सका कड़कड़ाती ठण्ड ।

तो  अलाव जला ली, अपने सतरंगी वादों की ,

और  ऊंची ऊंची लपटों  में  अर्पित कर दी दमकती परछाइयाँ |

 

अब ,सुबह बस बची है ,बस चमकीली राख ,

सोचता हूँ ,की कहाँ ठिकाने लगाऊ अपनी,

 

इन अनकही बातो का  ?

© Abhishek Yadav 2017

Image source- Google

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सर्दी

नर्म घासो के गद्दे पर, चमकीली ओश की बतलाती थी ,
की रात, तुम हो  ।
टूटी हुई पत्तियों की चुरमुराहट  सुनाती थी ,
तुम्हारे होने का एहसास ।
बासी काली राख, हुआ करती  थी,
तुम्हारे बातो की गवाह ।
और बेतर-बीती से बिखरे प्याले, गरम होते थे ,
तुम्हारे बोसे से ।

 

आज भी  ओश की बारिश होती है ,
आज भी चाय के प्याले सजते है ,
आज भी अलाव की राख पसरती है ,
आज भी पछुआ बहती है ,
और आज भी तारो की बारात सजती है ।

 

पर न जाने क्यों दो लोग उदास होते  , आजकल ,
एक मै और दूसरा बूढ़ा चाँद ,
क्यों की हम दोनों को आज कल ,
आपस में  ही बाते करनी पड़ती है,
बाकि अब क्या कहु तुमसे ,

 

अब तो पहले जैसी ठंडक भी कहा पड़ती है ।

 

© Abhishek Yadav -2017

Image Source- www.google.co.in

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वापसी

बड़े दिनों सो कुछ मित्रो ने किखा की मैं क्यों आज कल कुछ लिख नहीं रहा हूँ, कहा व्यस्त हूँ ,
बस सब मित्रो को धन्यवाद, और उनसब के लिए लिख रहा हूँ ।

कुछ वक्त की मज़बूरी थी , और कुछ मै बेबस था,
लिखना मेरा शौक ,नहीं, मज़बूरी भी है ,
बस ,कुछ मजबूर था , जिंदगी की आपा धापी में ,
और बदहवासी में, अब वापस आया हूँ
ये जान कर , की मैं कौन हूँ !!

बाकि सब कुशल मंगल है, अब फिर से बातें होगी

 

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I am back, i am alive

Some many for of my friends and reader were saying that, why I am not active and composing something, this is for those my good wishers.

I was cocooned, but not frozen,

I was busy, yet awaken,

I was involved in business but not broken,

Yes, I am back, not just for you, but this time for me,

for myself, because writing is not my hobby

but the expression of me to myself.

yes I am still alive

Yes, dear, I am back and this time more mature and expression, sorry for occupancy in materialistic and practical life.