Hindi

पुस्तैनी घर

बड़ी जद्दोजहद  के बाद , अपनी पुस्तैनी ज़मीं पर पैर रखे ,

कुछ झीज़कते , कुछ हिचकिचाते ,

उन उजड़े , बिखरे , बेतरतीब , छप्परों के नीचे,

अपने कदमो को जमाया |

 

 

सीलन भरी दीवारे और उसकी फीकी पड़ी पुताई ,

जो कभी , किलकारी भरती थी ,

वो रंगीन चबूतरे , लहलाती छज्जे ,

जो कभी सीधी खड़ी रहती थी |

 

 

न जाने क्यों आज वह पर

सड़न कुछ गलने की घुटी घुटी सी हवा भरी है ,

जो आँगन कभी चहल कदमी से भरा रहा करते थे ,

जिनकी शामें गुलजार रहा करती थी ,

जिनके दरवाजों पर , मेरे बुजुर्गो का कहकहा  हुआ करती थी |

 

 

उन दरवाजों  पर मरघट का सन्नाटा है ,

दम घोटू  माहौल सा बना बैठा है ,

मेरी यादें, इस घर से जुडी थी ,

मेरी लोरी की यादें , कहानियों की उड़ाने ,

मिटटी वाले चूल्हे की गर्मी ,भूसे की नरमी ,

ओष की ठंडी बूँद , और वो कुहरे भरी राते ,

और न जाने कौन कौन सी सब की सब ,

कच्ची मेढ़ो की तरह पग-पग बदल कर ,

मेरे संस्मरणों में घुमरने लगी |

 

 

जब तक कुछ बूंदे  मेरी आँखो से लुढक पड़ती ,

मानसून की बारिश बनकर ,

मैंने बंद कर दिए पुराने किवाड़ ,

अपने पुरानी यादो के ,

फिर चिराग बुझा कर , चल दिया ,

अपने जगमगाते , चमकीले , पथरीले  शहर की तरफ ,

जहाँ  मेरी जरूरतें, मेरा इंतज़ार कर रही थी |

 

 

औऱ मैं मुड़ भी गया, औऱ भाग पड़ा ,

न जाने क्यों पीठ दिखा कर |

 

 

Image Source – www.google.co.in

Advertisements