Hindi

पुरुष

 

शायद  तुमको लगता मै निशब्द , भावहीन , संवेदनहीन ,तर्कविहीन, हाड-मांस  काया , काठ का पुतला,

कुछ उजला, कुछ धुंधला,

संवेदनाये मुझ में भी है ,अभिव्यक्ति मुझे भी आती,

आँखों से खारापन मेरे भी बहता ,जिव्या मेरी भी कुलबुलाती  |

 

 

जीवन मेरा , सीमाये मेरी ,मेरी अभिलाषाएं ,मेरी महत्वाकांक्षये ,

सब की सब , एक दायरे में, एक सीमा में रहती ,शायद ही कभी अपनी मर्यादाओ से आगे बहती  |

 

इच्छाएं कर्मो के आगे रुक जाती,

भावनाएं दायरे में रह जाती,

स्वप्न जिम्मेदारियों में फस जाते,

महत्वाकांक्षये सम्मान से रह जाती  |

 

 

मै अपने बनाये संविधान से ही हारा,

लगता है बन गया बेचारा,

चाह कर मै अपने आप से बहार न आ सकता,

मै बहुत कुछ नहीं कर सकता,

क्यों की मै पुरुष हूँ   |

 

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© Abhishek Yadav 2015

image source – www.google.co.in

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